वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इसके खिलाफ मजबूत तर्क पेश किए हैं। कपिल सिब्बल, जो एक वरिष्ठ वकील और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं, ने इस बिल को संवैधानिकता के आधार पर चुनौती दी और इसे धार्मिक स्वायत्तता और समानता के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। आइए, उनके तर्कों और इस प्रक्रिया की समय-सीमा को विस्तार से समझते हैं।
कपिल सिब्बल के प्रमुख तर्क
धार्मिक स्वायत्तता पर हमला:
सिब्बल ने राज्यसभा में कहा कि वक्फ बोर्ड एक स्वायत्त संस्था है, जो मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सामाजिक जरूरतों के लिए बनाई गई थी। इस बिल के जरिए सरकार वक्फ संपत्तियों में हस्तक्षेप कर रही है, जो संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि अगर कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को वक्फ के लिए दान करना चाहता है, तो सरकार को उसे रोकने का कोई अधिकार नहीं है।
संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन:
सिब्बल ने जोर देकर कहा कि वक्फ संपत्ति को “अल्लाह की संपत्ति” माना जाता है, जिसे बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। बिल में प्रस्तावित संशोधन, जैसे गैर-मुस्लिम सदस्यों को वक्फ बोर्ड में शामिल करना और सरकारी नियंत्रण बढ़ाना, निजी संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 300A) को कमजोर करते हैं।
दोहरे मापदंड का आरोप:
उन्होंने हिंदू मंदिरों और वक्फ बोर्ड की संपत्तियों की तुलना करते हुए कहा कि दोनों के पास बराबर जमीन है, लेकिन सरकार केवल वक्फ पर नियंत्रण क्यों थोप रही है? यह समानता के सिद्धांत (अनुच्छेद 14) के खिलाफ है। सिब्बल ने काशी विश्वनाथ ट्रस्ट का उदाहरण दिया, जहां गैर-हिंदुओं को शामिल करने की कोई शर्त नहीं है, जबकि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने का प्रावधान लाया जा रहा है।
राजनीतिक मंशा पर सवाल:
सिब्बल ने सरकार पर आरोप लगाया कि यह बिल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने की राजनीतिक चाल है। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से सरकार की नीतियां, जैसे लव जिहाद और यूसीसी जैसे मुद्दे उठाना, एक खास समुदाय को बदनाम करने की कोशिश का हिस्सा हैं। यह संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के खिलाफ है।
संवैधानिकता पर सवाल:
सिब्बल ने तर्क दिया कि यह बिल संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाता है। वक्फ बोर्ड में सरकारी हस्तक्षेप से इसकी स्वायत्तता खत्म होगी, जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने वाले संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि वक्फ संपत्ति हमेशा वक्फ ही रहती है।
सपा का रुख
समाजवादी पार्टी ने भी इस बिल का कड़ा विरोध किया। सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी ने कहा कि यह बिल संविधान के खिलाफ है और मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर हमला है। पार्टी का मानना है कि यह विधेयक धार्मिक आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देता है और सरकार की मंशा वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करने की है।
प्रक्रिया और समय-सीमा
बिल का प्रस्तुति: वक्फ संशोधन विधेयक 2 अप्रैल 2025 को लोकसभा में पेश किया गया। स्पीकर ओम बिरला ने इस पर 8 घंटे की चर्चा तय की, जिसमें NDA को 4 घंटे 40 मिनट और विपक्ष को शेष समय मिला।
लोकसभा में पारित: 2 अप्रैल की रात 2 बजे, 12 घंटे की बहस के बाद बिल लोकसभा से पास हुआ। 520 सांसदों ने वोटिंग में हिस्सा लिया, जिसमें 288 ने पक्ष में और 232 ने विपक्ष में वोट दिया।
राज्यसभा में पारित: 3 अप्रैल की देर रात राज्यसभा में भी बिल पास हो गया। 128 सांसदों ने समर्थन में और 95 ने विरोध में वोट दिया।
पिछली प्रक्रिया: अगस्त 2024 में बिल पहली बार पेश हुआ था, जिसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया। JPC ने फरवरी 2025 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसे कैबिनेट ने मंजूरी दी। हालांकि, विपक्ष ने आरोप लगाया कि उनके सुझावों को नजरअंदाज किया गया।
निष्कर्ष
कपिल सिब्बल और सपा ने वक्फ बिल को संवैधानिकता, धार्मिक स्वतंत्रता, और समानता के आधार पर चुनौती दी। सिब्बल के तर्कों ने इस बिल को एक समुदाय-विशेष के खिलाफ साजिश के रूप में पेश किया, जबकि इसकी प्रक्रिया में विपक्ष की आपत्तियों को दरकिनार करने का आरोप भी लगा। यह मुद्दा भविष्य में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का विषय बन सकता है, जहां इसकी संवैधानिक वैधता की गहन जांच होगी।



