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हक़ (सही ) और बातिल ( ग़लत) को पहचाने जनाबे हूर अलैहिस्सलाम के बारे मे पढ़ें

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यज़ीद ने दमिश्क से जनाबे हूर को अपनी फौज का सिपेसालार बनाकर भेजा और कहा हुसैन अलैहिस्सलाम को क़र्बला मे घेरकर क़त्ल कर दो,

जब हूर इमाम हुसैन को क़र्बला के मैदान मे घेरकर लाया तो हुसैन अलैहिस्सलाम ने देखा हूर और उसका लश्कर प्यास से बेहाल है तो इमाम ने हूर से कहा ए हूर बातें बाद मे होगी पहले पानी पियो और अपने लश्कर को पानी पिलाओ,
हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने भाई अब्बास अलैहिस्सलाम से कहा अब्बास हूर को और उसकी फौज को पानी से सेराब करो,
तवारीख़ मे लिखा है इमाम हुसैन ने ना सिर्फ हूर के लश्कर को पानी पिलाया बल्कि उनके घोड़ो को भी पानी पिलवाया जो प्यास से ज़ुबान बाहर निकाले थे,
हूर ने हुसैन अलैहिस्सलाम से फरमाया ऐ फ़रज़न्द ए रसूल मुझे वक्त के खलीफा यज़ीद ने भेजा है और मेरे लिए हुक्म है की मे या तो आपसे यज़ीद के लिए बेयत ले लूँ या फिर आपको क़त्ल कर दूँ,
इसलिए मे आपसे चाहता हूँ आप यज़ीद की बेयत कर लें तब मौला हुसैन ने फरमाया ऐ हूर मे नही चाहता तेरी मा तेरे गम मे रोये इतना सुनकर हूर गुस्से से लाल होकर बोला आप नवासा ए रसूल हो और आपकी वालिदा बीबी फातिमा हैं जिनका मे तो क्या ये पुरी क़ायनात एहतराम करती है सब पर उनका एहतराम करना फ़र्ज़ है इसलिए मे कोई गुस्ताखी नही करता बस आपको सोचने की मोहलत देता हूँ ,
और फिर हूर की फौज ने भी क़र्बला मे पड़ाव डाल लिया,
लेकिन हूर की बातें सुनकर इमाम हुसैन समझ गये थे की हूर भले हि यज़ीद का सिपेसालार हो लेकिन उसके दिल मे आले रसूल से मोहब्बत थी,
जब मुहर्रम की कुछ शब बीत गयी तो जनाबे हूर को अपनी गलती का एहसास हुआ ,
जनाबे हूर समझ गये की वो गलत पार्टी की तरफ से क़र्बला आ गये और उन्होंने अपने गुलाम और बेटे को बुलाकर कहा पता नही मुझे ऐसा क्यो लग रहा है जैसे मे दोज़ख मे खड़ा हूँ और जन्नत मुझे पुकार रही है,
कुछ देर सोचने के बाद हूर अलैहिस्सलाम ने बेटे से कहा
मेरे बेटे हुसैन अलैहिस्सलाम हि हक़ पर हैं और हमे उनका साथ देना चाहिए ,
चुंकि बेटा और गुलाम हलाली थे तो कहा अब्बा फिर सोच क्या रहे हो चलो हक़ की तरफ, बढ़ो हुसैन की तरफ,
जनाबे हूर बोले बेटा मे अली के लाल की तरफ कैसे बढू मे उनसे शर्मिंदा हूँ मेने अपने मौला की सवारी की लगाम को बेहूदगी से खेंचा और इमाम को यहाँ ले आया इसलिए बेटा तुम एक काम करो मेरी आँखों पर पट्टी बांधो ताकि फरज़न्द ए रसूल का सामना ना हो और मेरे हाथ पीछे बाँध देना जिससे मे मुजरिम की तरह हुसैन की बारगाह मे पेश होऊँ,
गुलाम और बेटे ने ऐसा हि किया आँखों पर पट्टी बांधी और पीछे हाथ बाँध दिये और खेमा ए हुसैन की तरफ बढ़ गये,
जनाब ए हूर को आता देख हुसैन मुस्कुराए और मौला अब्बास से कहा भाई अब्बास देखो मेहमान आ रहा है इस्तक़बाल करो जनाबे अब्बास हूर की तरफ बढ़े ,
उधर जनाबे हूर चलते चलते बेटे और गुलाम से पूछ रहे थे तो बेटा बता रहा था बाबा आपको लेने अब्बास और अली अकबर आ रहे हैं,
हूर के मुँह से निकला अल्लाह हो अकबर,
जनाबे हूर ने फिर पूछा अब क्या हो रहा है तो बेटे ने बुलंद आवाज़ से कहा बाबा अब मौला हुसैन भी आपके इस्तक़बाल के लिए आ रहे हैं तो हूर बेकरार हो गये और बोले ए मेरे बेटे जैसे हि मौला मेरे करीब आएं तो मुझे उनके कदमो मे गिरा देना मे गिड़गिड़ा कर माफ़ी मांगूगा,
बेटे ने भी ऐसा हि किया जनाबे हूर को मौला हुसैन के कदमो मे गिरा दिया,
तब मौला ने बढ़कर हूर को उठा लिया और गले से लगाकर फरमाया ए हूर तेरी माँ पर मेरा सलाम हो जिसने हूर जैसा बेटा जना,
मौला हुसैन ने हूर से रोकर कहा ए हूर जब तु पहली मर्तबा मेरे पास आया था तब मेरे पास तुझे पिलाने के लिए पानी भी था और खाना भी लेकिन अब मेरे पास पानी भी नही तो हूर बोले मौला मुझे शर्मिंदा ना करें इस सबका ज़िम्मेदार मे हूँ,
मोमिनो फिर वो वक्त भी आया जब इमाम हुसैन ने जनाबे हूर को जंग की इजाज़त दी ,
जनाबे हूर बोहोत बहादुरी से लड़े कई यज़ीदियों को जहन्नुम रवाना किया और अपने मौला पर क़ुर्बान हो गये यहाँ तक्की उनका गुलाम और बेटे भी दीन् ए नबी पर क़ुर्बान हुए,
इस तरह से हूर भी अलैहिस्सलाम हो गये,

इन्ना लिल्लाहे वा इन्ना इलेहे राजेऊन ,
सलाम हो क़र्बला के शहीदों पर!

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