मैंने जब से होश संभाला है,
ईरान को हमेशा मज़लुमो की हिमायत में आवाज उठाते लड़ते देखा है,
जिसकी वजह से ईरान पर अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए गए हैं
लेकिन वो अपनी इस जंग में
अल्लाह के अलावा किसी की परवाह नहीं करता,
अभी हाल में ग़ाज़ा नागरिकों का इजराईल द्वारा हर अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए,
बच्चे,जवान, बूढ़े, महिलाओं का खून बहाया क़त्ले आम किया,
कुछ मुस्लिम देश इज़राईल के आतंकवादी की कार्रवाई के खिलाफ बोले लेकिन कुछ समय बाद सब ने अपना क़दम पीछे हटा लिया,
इस संबंध में ईरान को अनेको कुर्बानियां देना पड़ी है,
जैसे शहीद जनरल क़ासिम सुलेमानी,
जैसा कि सब जानते हैं के ईरान के राष्ट्रपति व विदेश मंत्री अधिकारियों का एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई,
यह सब जानते हैं कि इस दुर्घटना में ईरान से नफरत करने वाले देश का हाथ हो सकता है,
मैं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने एक दिन का राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया,
मैं यह सोच रहा था कि ईरान की अवाम मौलाना,नेताओं को मजलूमों के खिलाफ आवाज उठाना और शहादत देने की ताक़त कहां से मिलती है
बेशक कर्बला,
एक शेर पेशे खिदमत है,
जब भी जमीन-ओ-ज़र्फ़ का सौदा हो दोस्तों ll
क़ायम रहो हुसैन के इंकार की तरह
लेकिन जब भी हम कर्बला के शहीदों की कुर्बानी से प्रेरणा लेते हुए ईरान के नेता मौलाना आयतुल्लाह और आवाम को देखता हूं,
उसके बाद हमारे देश से ईरान इस्लामी शिक्षा प्राप्त कर हिंदुस्तान लौटे लोगों को देखता हूं,
जो हमेशा जुल्म के आगे सजदा कर लेते हैं,
तो क्या ईरान में इन इस्लामिक शिक्षा प्राप्त करने वालों को कर्बला का वाक्य पढ़ाया जाता है,
मजलूमों पर होते हुए अत्याचार के खिलाफ उस पर डटे रहने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती,
खाली ईरान के नागरिकों को ट्रेनिंग दी जाती है,
क्योंकि वहां से पढ़ कर आए मौलाना मिम्बर रसूल से अहल्लेबैत पर हुए जुल्मो/ सितम के खिलाफ बड़ी जोर शोर से पढ़ते हैं,
लेकिन जब वक्त आता है,
तो वर्तमान ज़ालिम के ख़िलाफ नहीं खड़े हो पाते,
और अपने को उसका भक्त कहने लगते हैं,
मेरी ईरान के उन मदरसों, यूनिवर्सिटी के लोगों से गुजारिश है कि हमारे देश के मौलानाओं को कर्बला की शहादत पढ़ने के साथ.ज़ुल्म, ज़्यादती,नाइंसाफी के खिलाफ डटे रहने की ट्रेनिंग दी जाए, ऐसी ट्रेनिंग में फेल होने वालों को डिग्री ना दी जाए,
शब्बीर हुसैन





