पहले चित्र में मीर जाफ़र और उनके बेटे मीरान ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि विलियम वाट्स को 1757 का समझौता पत्र दे रहे हैं. मीरान ने बाद में सिराजुदौला को मारा था. दूसरे चित्र में ईस्ट इंडिया कंपनी के बंगाल गवर्नर (बाद में बने थे) रॉबर्ट क्लाइव पलासी की लड़ाई के बाद नवाब बनाए गए मीर जाफ़र से मिल रहे हैं.
23 जून, 1757 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिराजुदौला को हराकर भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का रास्ता साफ़ कर दिया था. इसमें उसकी सहायता की थी मीर जाफ़र और जगत सेठों ने. तब भारत समेत दुनिया के अनेक हिस्सों में अंग्रेज़ों और फ़्रांसीसियों के बीच सात-साला युद्ध चल रहा था.
सिराजुदौला अपनी पूरी सेना क्लाइव के ख़िलाफ़ नहीं लगा सके थे और उनसे असंतुष्ट नवाबों और कारोबारियों का गठजोड़ भी अंग्रेज़ों से हो चुका था. नवाब सिराजुदौला अफ़ग़ान शासक अहमद शाह अब्दाली (जिन्होंने आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान बनाया) तथा मराठों के हमलों के भय से पूरी सेना अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नहीं लगा सके थे. उन्होंने फ़्रांसीसियों से कुछ गठबंधन का प्रयास किया.
जिन सरदारों और जगत सेठों पर उन्होंने भरोसा किया, उन्होंने ही उन्हें दग़ा दे दिया. और, तीन हज़ार सिपाहियों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने बिना लड़े बंगाल की पचास हज़ार सेना को हरा दिया.
उस समय कई कारक भारत में यूरोपीय साम्राज्यवाद के प्रसार में सहायक हो रहे थे, पर जो सबसे बड़ा कारण था, इतिहास में अक्सर उसे अनदेखा किया गया है.
साल 1707 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर की मौत के बाद अगले पचास साल तक देश के भीतर जो क़त्लेआम मचा, लूट बढ़ी, उसमें देश के हर क्षेत्र के जो अभिजात्य थे, जो अग्रणी थे, जैसे- सेनापति, रणनीति बनाने वाले, कूटनीतिक, ज्ञानी, कवि, संगीतकार, चित्रकार, शिक्षक, शिल्पकार, वास्तुकार, व्यवसायी आदि, वे मार डाले गए.
किसी भी क़ौम में जब अभिजात्य ख़त्म हो जाता है या नाकारा हो जाता है, उस क़ौम को ख़ून के आँसू रोने पड़ते हैं और बहुत दिनों तक रोने पड़ते हैं. इतिहास से सीखना चाहिए.
(चित्र साभार





