राजा मानसिंह के शासनकाल जैसा स्वर्णिम काल हिंदुओ का पिछले २००० सालों में नही आया । राजा मानसिंह भारत के एक महान धनुर्धर और दिग्विजयी राजा थे । उनकी दान वीरता और स्मृति संसार में चिरकाल तक बनी रहेगी ।।
राजा मानसिंह का पूरा जीवन ऐसा रहा की अपने जीवन काल के कुल ७० वर्षो में से ४४ वर्ष उन्होंने युद्ध के मैदान में बिताए ।
चित्तौड़ पर विजय ।।
खिंचीवाड़ा पर विजय ।।
गुजरात, अहमदाबाद, खंबात
और सूरत के पठानों पर विजय ।।
शेर खान फौलादी पर विजय ।।
इख्तियारुमुल्क पर विजय ।।
बिहार में पठानों पर विजय ।
अफगानिस्तान पर विजय
ईरान पर विजय ।।
उज़्बेकिस्तान पर विजय
कजाकिस्तान पर विजय
किर्गिस्तान पर विजय
ताजिकिस्तान पर विजय
तुर्कमेनिस्तान पर विजय ।
मोटे तौर पर पूरा सेंट्रल एशिया
राजा मानसिंह ने जीत लिया था ।।
इसके साथ ही बंगाल और उड़ीसा में भी पठानों को धूल चटाकर राजा मानसिंह ने विजयश्री प्राप्त की ।।
श्रीमानसिंह ने अपने जीवन में जितने भी युद्ध किए, उन अधिकतर युद्धों में उन्हे एक लाख से भी बड़ी संख्याबल वाली सेना का सामना करना पड़ा था ।। कइयों बार रहा श्रीमानसिंह के नेतृत्व में आमेर की सेना ने शत्रुओं को पूरी की पूरी सेना का ही वध कर दिया था ।
अकबरनामा में वर्णन मिलता है की राजा मानसिंह की बिहार बंगाल और उड़ीसा की लूट बहुत लाभदायक रही । क्यों की इन तीनो ही स्थानों का राजा एक था, दाऊद खान । जो अफगान मूल का पठान था ।। इसका ही सेनापति था ” काला पहाड़ ” । जिसने उड़ीसा के कोर्णाक मंदिर को तोड़ने के बाद भगवान जगदीश के मंदिर को हानि पहुंचाने की हिमाकत भी की थी ।।
राजा मानसिंह ने यहां शत्रुओं को मसल कर रख दिया ।। दाऊद खान उस समय एशिया की सबसे बड़ी शक्ति था ।। ८०० से ज्यादा आधुनिक तोपें उसके पास थी ।। उसे रहा मानसिंह ने ऐसी धूल चटाई की उसकी ८ लाख से अधिक विशाल पैदल सेना ने राजा मानसिंह के आगे सरेंडर कर दिया ।। दाऊद खान की ४४०० नाव और नोसेनिको को राजा मानसिंह ने अपनी हिरासत में ले लिया । १०,००० से अधिक स्पेशल ट्रेंड सैनिकों को उनके घोड़े सहित हिरासत में लिया ।।
इस विजय के बाद राजा मानसिंह ने जगन्नाथपुरी मंदिर का जीर्णोधार करवाया ।।
राजा मानसिंह का काल केवल युद्धकाल ही कहा जाएं ऐसा नही है । इस महान राजा के काल में देश एक अलग ही बुलंदी पर पहुंच गया था ।। साहित्य जगत को राजा मानसिंह ने इतना प्रोत्साहन दिया की लाखो लाखो रुपया कवियों को दान कर देते थे । गांव के गांवों का राज पाठ कवियों को सौंप देते ।। उनके छोटे मोटे चारणो के पास भी १००-१०० हाथी होते थे ।।
राजा मानसिंह के अन्न के गोदामों की संख्या एक लाख थी । किसी समय गुजरात आदि क्षेत्रों में युद्ध एवम अकाल के कारण अन्न संकट आया , तो आमेर से ही अन्न गया, और इतना अन्न गया, की गुजरातवासियो को एक दिन भी अन्न की कमी महसूस नहीं हुई ।।
इंफ्राटेकचर के विकास में भी राजा मानसिंह पीछे नही रहें । देश के अधिकांश गांव, कस्बे , तालाब, परकोटे, उन्ही के द्वारा निर्मित हैं।।
आज भी बंगाल में मानभूमि, विरभूमि, सिंहभूमि, उन्ही के नाम से विख्यात है ।। आमेर में मानसागर, मानसरोवर, मानतालाव, मानकुंड, काशी में मान घाट मान मंदिर मानगांव, काबुल में माननगर, मानपुरा, मानगढ़ , मानदेवी, मानबाग, मानदरवाजा, मानमहल, मानझरोखा, मानपटन और मानशस्त्र आदि है ।।
आमेर का मानमहल उन्ही की देन है । गोविंददेवजी, शिलामाता मंदिर, हर्षनाथभैरवमंदिर, जगतशिरोमणि मंदिर, वहां के महल के ८ परकोटे आदि राजा मानसिंह की देन है ।
इसके अलावा जयगढ़, सांगानेर, मोजमाबाद, पुष्कर, अजमेर, दिल्ली, आगरा, फतेहपुर, रोहताशगढ़ आदि के महल, तथा मथुरा, वृंदावन काशी, हरिद्वार, पटना आदि के घाट और कुंज अधिकांश मंदिर राजा मानसिंह की देन है ।
ब्रह्मपुत्र के सलिमनगर, अटक बनारस और जयपुर में भी राजा मानसिंह ने कई मंदिर मुहल्ले बनाएं ।।
एक जन्म में इस महान राजा के गुणों का बखान नही हो सकता ।





