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14 फरवरी 1483 बाबर का जन्म - The Revolution News
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14 फरवरी 1483 बाबर का जन्म

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आज के दिन यानी 14 फ़रवरी 1483 को फ़िरदौस मकानी ज़हीर उद्दीन मुहम्मद ‘बाबर’ का जन्म हुआ था। बाबर को इस महाद्वीप में एक अज़ीम सल्तनत क़ायम करने का शरफ़ हासिल है। बाबर का सिलसिला चुग़ताई तुर्क तैमूर से मिलता है तो माँ की तरफ़ से उसका नसब चंगेज़ ख़ान से मिलता है। 10 जून 1494 को पिता उमर शेख़ मिर्ज़ा की दुर्घटना में असमय मृत्यु के बाद 11 वर्षीय बाबर फ़रग़ना का शासक बना। लेकिन, उसके चचा और मामा को सोरिशों का नतीजा यह हुआ कि वह ग्यारह बरस तक परेशान रहा। बाबर ने दो साल बाद समरक़न्द पर हमला किया और क़ब्ज़ा भी कर लिया था लेकिन इस बीच उसके हाथ से बाद फ़रग़ना निकल गया। लेकिन, फ़रग़ना को फिर से जीतने के अपने प्रयास में, उसने समरक़न्द पर भी नियंत्रण खो दिया।
इसी बीच सेंट्रल एशिया में शायबानी (चेंगेज़ ख़ान के पाँचवें पुत्र जोशी के वंशज) लीडर मुहम्मद शायबानी ख़ान के नेतृत्व में उज़्बेक क़बीलों ने राजनैतिक रूप से मज़बूत होना शुरू कर दिया था। इसलिए जब बाबर ने 1501 में दोनों क्षेत्रों पर फिर से क़ब्ज़ा करने का प्रयास किया तो उसका प्रयास तो मुहम्मद शायबानी ख़ान ने विफल कर दिया।
1504 में बाबर क़बूल पर क़ब्ज़ा करने में सफल हो गया। उधर ईरान में शाह इस्माइल के नेतृत्व में सफ़वी हुकूमत तशकील पा रही थी। शाह इस्माइल ने बाबर को एक “ऐसेट” के रूप में लिया और सेंट्रल एशिया में उसके अभियानों में सैन्य मदद की ताकि उसके सामरिक हितों को लाभ पहुँचता रहे। ईरान की मदद से बाबर के आधिपत्य में समरक़न्द सहित तुरक़िस्तान भी आ गए लेकिन जल्द ही दुबारा से शायबानियों का उसकी तमाम ज़मीन पर क़ब्ज़ा हो गया। और जब, बाबर पर उज़्बेकों ने ज़मीन तंग कर दी तो बाबर ने अपना ध्यान हिंदुस्तान की तरफ़ किया।
उस्मानी सल्तनत के साथ बाबर के शुरुआती संबंध खराब थे क्योंकि सुल्तान सेलिम प्रथम ने उसके प्रतिद्वंद्वी उबायदुल्ला खान को शक्तिशाली बंदूक़ें और तोपों से सहायता की थी। 1507 में सलीम प्रथम ने जब स्वयं को अधिपति के रूप में स्वीकार करने का आदेश दिया तो बाबर ने इनकार कर दिया और गजदेवन की लड़ाई के दौरान उबैदुल्लाह खान की सेना का मुकाबला करने के लिए ईरानी क़िज़िलबाश सैनिकों को इकट्ठा किया। 1513 में, सलीम प्रथम ने बाबर के साथ इस डर से कि वह ईरानी गुट में शामिल न शामिल हो, उस्ताद अली क़ुली को तोपखाने और मुस्तफा रूमी को मैचलॉक मार्समैन, और कई अन्य तुर्क सामग्री को भेजा, ताकि बाबर को युद्धों में सहायता मिल सके। इसके बाद बाबर ने मैदान में (केवल घेराबंदी के बजाय) muskets और तोपों का उपयोग करने की रणनीति अपनाई, जिससे उसे भारत में एक महत्वपूर्ण लाभ मिला।
16 वीं सदी में हिंदुस्तान के तख़्त पर पख़्तून ख़िलजी (पश्तो-ग़िलची) क़बीले की एक शाख़ लोदी वंश की हुकूमत थी। सुल्तान इब्राहिम लोदी अपने पिता सिकंदर लोदी की तरह कुशल और योग्य शासक नहीं था।
समरक़न्द की अपनी तीसरी हार के बाद, बाबर ने एक अभियान शुरू करते हुए, उत्तर भारत की विजय पर पूरा ध्यान दिया, क्योंकि उसके अनुसार यह इलाक़ा इसके जद तैमूर के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था।
1519 में वह चिनाब नदी तक पहुंच गया, 1524 में उसका उद्देश्य केवल पंजाब में अपने शासन का विस्तार करना था। उस समय उत्तर भारत के कुछ हिस्से लोदी वंश के इब्राहिम लोदी द्वारा शासित दिल्ली सल्तनत का हिस्सा थे, लेकिन सल्तनत ढह रही थी और अधिकारियों को अपनी वफ़ादारियां बदलने में कोई शर्मिंदगी नहीं होती थी। इसी बीच बाबर को पंजाब के गवर्नर दौलत खान लोदी और इब्राहिम के चाचा अला-उद-दीन के साथ राजपूताना से राणा सांगा से हिंदुस्तान पर आक्रमण का निमंत्रण मिला। बाबर ने इब्राहिम को अपने राजदूत के माध्यम से इस आशय का पैग़ाम भेजा कि तैमूर का वंशज होने के नाते सिंहासन का असली उत्तराधिकारी वह था, लेकिन राजदूत को लाहौर, पंजाब में हिरासत में लिया गया और महीनों बाद रिहा कर दिया गया।
बाबर ने 1524 में लाहौर के लिए प्रस्थान शुरू किया लेकिन पाया कि दौलत ख़ान लोदी को इब्राहिम लोदी द्वारा भेजे गए बलों द्वारा खदेड़ दिया गया था। जब बाबर लाहौर पहुंचा, तो उसने लोदी की सेना को खदेड़ दिया गया। इसके बाद लोदी के एक अन्य विद्रोही चाचा आलम खान को गवर्नर के रूप में रखकर दीबलपुर की ओर कूच किया। लेकिन, आलम ख़ान को लोदी की सेना ने काबुल भागने पर मजबूर कर दिया। जवाब में, बाबर ने आलम ख़ान को सैनिकों के साथ भेजा जो बाद में दौलत खान लोदी के साथ शामिल हो गए, जिसके नेतृत्व में 30,000 सैनिकों ने दिल्ली में इब्राहिम लोदी को घेर लिया। लेकिन सुल्तान इब्राहिम ने इनको आसानी से हरा दिया और आलम की सेना को खदेड़ दिया। इस पूरे घटनाक्रम से बाबर को एहसास हो गया कि उसका पंजाब पर क़ब्ज़ा करना आसान नहीं है।
नवंबर 1525 में बाबर को पेशावर में ख़बर मिली कि दौलत ख़ान लोदी ने पाला बदल लिया है, तो बाबर ने दौलत खान लोदी का सामना करने के लिए लाहौर की ओर कूच किया तो दौलत ख़ान की सेना के हाथ पैर फूल गए। उसने आत्मसमर्पण कर दिया तो बाबर ने भी उसे क्षमा कर दिया गया। इस प्रकार सिंधु नदी पार करने के तीन सप्ताह के भीतर बाबर पंजाब का मालिक बन गया, और अब उसका इरादा दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने का था।
बाबर सरहिंद होते हुए दिल्ली की ओर बढ़ा। वह 20 अप्रैल 1526 को पानीपत पहुँचा। उधर इब्राहिम लोदी की लगभग 100,000 सैनिकों और 100 हाथियों की सेना के साथ मौजूद था। अगले दिन युद्ध शुरू हुआ जिसमें बाबर ने तुलुग्मा की रणनीति का इस्तेमाल किया। इब्राहिम लोदी की सेना को घेर लिया गया और साथ में सीधे तोपख़ाने की आग का सामना करने के लिए उसकी सेना मजबूर हो गयी। इस युद्ध में हाथियों का इस्तेमाल स्वयं इब्राहीम के लिए घातक साबित हुआ और युद्ध में ही इब्राहिम लोदी मारा गया और इस प्रकार लोदी वंश समाप्त हो गया।
युद्ध के बाद, बाबर ने दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया, लोदी का सिंहासन ले लिया, और भारत में महान मुग़ल शासन नींव पड़ गयी। लेकिन अभी एक बहुत बड़े संकट का सामना था- वह था सिसोदिया क़बीले के राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत और अफ़ग़ानों का सामूहिक प्रतिरोध।
बाबर को शिकायत थी कि मदद के वायदे के बावजूद राणा सांगा तटस्थ रहा, उधर राणा का यह अनुमान था कि अपने पूर्वज तैमूर की तरह यहाँ की गर्मी की वजह से बाबर वापस चला जाएगा तो दिल्ली पर उसका क़ब्ज़ा हो जाएगा। सिकंदर लोदी का छोटा बेटा महमूद लोदी, जिसे अफगानों ने अपना नया सुल्तान घोषित किया था, अफगान घुड़सवारों की एक टुकड़ी के साथ बाबर के ख़िलाफ़ गठबंधन में शामिल हो गया। मेवात के शासक खानज़ादा हसन ख़ान मेवाती भी अपने आदमियों के साथ गठबंधन में शामिल हो गए। हसन ख़ान का यह स्पष्ट मत था कि बाबर एक विदेशी आक्रांता है जबकि अफ़ग़ानियों की नाराज़गी बाबर की वायदा खिलाफ़ी को लेकर थी।बाबर ने उनके खिलाफ गठबंधन में शामिल होने वाले अफगानों की काफ़िर और मुर्तद के रूप में निंदा की। सांगा ने बाबर को निष्कासित करने और लोदी साम्राज्य को बहाल करने के घोषित मिशन के साथ इस राजपूत-अफगान गठबंधन को नेतृत्व प्रदान किया। हसन ख़ान ने मशविरा दिया कि गुजरात के सुल्तान मुज़फ़्फ़र शाह को भी इस गठबंधन में शामिल कर लिया जाए ताकि उसकी तोपें सहायक सिद्ध हो सकें, तो राणा ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि उसे तो वह पूर्व में पराजित कर चुका हैं इसलिए तोपख़ाने से कोई विशेष लाभ हासिल नहीं होगा। घटना क्रम यह है की कि 1520 में गुजरात की रियासत इदार में उत्तराधिकार का मसला पैदा हुआ तो राणा सांगा और गुजरात के सुल्तान मुज़फ़्फ़र शाह मुख़ालिफ़ पक्षों के साथ खड़े थे। राणा सांगा के गठबंधन ने मुज़फ़्फ़र शाह को अहमदनगर वापस लौटने पर मजबूर किया और राणा सांगा शहर के निकटवर्ती इलाक़ों में लूटमार और धार्मिक स्थलों को क्षतिग्रस्त करके वापस मेवाड़ लौट गया था।
फ़रवरी 1527 में शुरुआती झड़पों के बाद बाद मुग़लों को यह एहसास हो गया था कि उनका मुक़ाबला एक मज़बूत संगठन से है। इसी दौरान यह भी अफ़वाह उड़ गयी कि मंगल ग्रह पश्चिम में स्थित है और जो पक्ष मैदान ए जंग में पूर्व दिशा में होगा उसकी हार निश्चित है। बाबर ने अपनी सेना मनोबल बढ़ाने के लिए अनेक प्रपंचों का इस्तेमाल किया, एक जोशीली तक़रीर के बाद जंग को जिहाद कहते हुए भविष्य में इस्लामी तौर तरीक़े अपनाने का वचन दिया।
दोनों पक्ष 16 मार्च 1527 को ख़ानवा में आमने सामने थे। इस भयंकर युद्ध में तोपख़ाना और muskets निर्णायक सबित हुए। बाबर के अनुसार गठबंधन सेना के घुड़सवार सालार रावल उदय सिंह सहित भूपति राव, मानिक चंद चौहान, दलपत राव, और कर्म सिंह मैदान में मारे गए, राणा सांगा फ़रार हो गए।हसन ख़ान मेवाती भी मैदान ए जंग में मारे गए।
लेकिन, बाबर अधिक समय तक जीवित नहीं रहा, संभवतः ज़हर के असर से केवल 47 साल की आयु में 5 जनवरी 1531 को उसका निधन हो गया।
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इसके बाद तुज़क ए बाबरी का संक्षिप्त ज़िक्र ज़रूरी है।बाबर को अपनी मादरी ज़बान तुर्की के साथ साहित्य और शासन की भाषा फ़ारसी पर भी समान अधिकार हासिल था। तुज़क ए बाबरी और तुज़क ए जहांगीरी के बाद केवल महारानी विक्टोरिया के संस्मरण को शोहरत हासिल हुई है। तुज़क ए बाबरी का फ़ारसी संस्करण अकबर के समय सामने आया था लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि 1502 से 1503, 1508 से 1519 और जनवरी 1520 से नवम्बर 1525 तक का अहवाल हमेशा के लिये विलुप्त हो गया है। बाबर इस मामले में ख़ुशक़िस्मत था कि उसकी साहित्यिक परवरिश उसकी माँ निगार ख़ानम और नानी दौलत बेगम की निगरानी में हुई थी। जिसकी वजह से वह एक विद्वान होने के साथ एक जिज्ञासु भी था। तुज़क ए बाबरी साथ तुर्की में उसका एक और work- दर फ़िक़ मुबयीन (Exposition of the Islamic Jurisprudence) भी क़ाबिल ज़िक्र है।
लीडेन एवं अर्सकिन ने 1826 ई. में ‘बाबरनामा’ का अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद किया। बेवरिज ने इसका एक संशोधित अंग्रेज़ी संस्करण निकाला। इसके अतिरिक्त बाबर को ‘मुबइयान’ नामक पद्य शैली का जन्मदाता भी माना जाता है। इसके अतिरिक्त बाबर ने ‘खत-ए-बाबरी’ नामक एक लिपि का भी अविष्कार किया।
हक़ीक़त यह है कि बाबर न केवल फारसी साहित्य का शैदायी था बल्कि उसके साम्राज्य ने भारतीय उपमहाद्वीप में फारसी लोकाचार -Indo-Persian तहज़ीब के विस्तार को जन्म भी दिया।
तुज़क ए बाबरी तुर्की साहित्य की असाधारण गद्य रचना है।इतना खूबसूरत गद्य कि आप पढते हुए मुग्ध हो जाय।उसने लोदी बंश की तुलना में बहुत बेहतर राज कायम किया।उसने हुमाँयू को शासन का चार्टर दिया उसे देखने से उसकी शख्सियत का अंदाज होता है।उसने कहा कि तुम कभी अवाम के साथ मजहब के आधार पर न्याय मत करना, तुम अवाम के मजहब में कभी हस्तक्षेप मत करना।लोदी की शहादत के बाद उसने उसके शव के साथ सम्मान जताया।सारी रवायत पूरी की और उसकी याद में बेदी बनवायी । उसकी माँ से कहा तुम मुझे लोदी की जगह अपना बेटा मानों और उसका मनसब बरकरार रखा।जब लोदी की माँ ने उसके खाने में जहर मिलवाया तो उसने उसे काबुल भेजा।आत्मग्लानि से वह रास्ते में ही सिन्धु में कूदकर जान दे दी।वह मध्यकाल का पहला शासक था जिसने अपने पुत्र को राज के लिए भाइयों की हत्या करने से मना किया।वह बहुत ही कम दिनों तक शासन किया फिर भी उसने दिल्ली से काबुल के बीच बहुत सारे सराय बनवाये।
उज्बेकिस्तान में बाबर को एक राष्ट्रीय नायक माना जाता है।14 फरवरी 2008 को, उनकी 525 वीं जयंती मनाने के लिए देश में उनके नाम पर डाक टिकट जारी किए गए थे। बाबर की कई कविताएँ लोकप्रिय उज़्बेक लोक गीत बन गई हैं, विशेष रूप से शेराली जोरायेव द्वारा। इसके अलावा बाबर किर्गिस्तान में भी एक राष्ट्रीय नायक है।
भारत में संघी मानसिकता मुग़ल दौर को विकृत कर के पेश करती रही है, अब तो हालात और भी ख़राब हो चुके हैं। बीसवीं सदी में इस तरह का उभार यूरोप में हुआ जो विश्वयुद्ध में करोड़ों की हत्याओं का कारण बना।
इतिहास को वर्तमान में लाकर कलह पैदा करने वाली कौमें अपनी बर्बादी का सबब बनती हैं।

असग़र मेहदी

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