जलेबी ईरानी है और एक स्मृति ईरानी हैं। इमरती ईरानी नहीं है। ये अभी आयी गर्मागर्म इमरती है। ये तो लखनऊ की है लेकिन जौनपुर की बेनीसाव की इमरती के क्या कहने। ग़दर 1857 के आसपास के दौर से शीराज़-ए-हिन्द जौनपुर में बादशाह अकबर के दौर में बने शाही पुल के पास बनती आ रही है। बेनीसाव ने बनाना शुरू की तो उन्हीं के नाम से मशहूर हो गई। अब बेनीसाव के वंशज दुकान चलाते हैं। कई दुकानें हो गईं हैं,सबकी इमरती अच्छी है। बेनीसाव की इमरती चीनी की जगह शक्कर से बनती है। हम तो जब भी जौनपुर गए बेनीसाव की इमरती ज़रूर नोश फ़रमायी और लोगों को बांटने के लिए लाए। बहुत से लोग जौनपुर से मेरे लिए भी इमरती लाते हैं। हमें पसंद है। बेनीसाव की इमरती कुछ सफ़ेदी लिए होती है और नर्म होती है। मुँह में रखते ही घुल जाती है। शाही पुल के पास जौनपुर का इत्र भी मिलता है जो कन्नौजी इत्र से उन्नीस नहीं होता। जौनपुर में जहाँ बेनीसाव की दुकान है उस शाही पुल के बनने की दास्तान भी बहुत रोचक है। अकबर बादशाह के दौर में जौनपुर के गवर्नर मुनीम ख़ान था। एक शाम एक बुज़ुर्ग़ कोईरी महिला सब्ज़ी बेचकर नदी किनारे आयी तो नदी में नाव नहीं थी।बुढ़िया रोने लगी कि हम अब कैसे नदी पार अपने घर जाएंगे। संयोग से गवर्नर भी वहीं अपने सैनिकों के साथ था। सन् 1568 का वक़्त रहा होगा। गवर्नर ने बुढ़िया से उसके रोने का कारण जाना। फिर कहा कि हम यहाँ पुल बनवा देते हैं,तब आपको सब्ज़ी बेचकर जाने में परेशानी नहीं होगी। गवर्नर ने हुक्म दिया कि गोमती नदी पर यहाँ पुल बनाया जाए। पुल बन गया। आर्किटेक्ट अफ़ज़ल अली ख़ान अफ़ग़ानी थे। मुग़लिया शैली में बना शाही पुल आज भी जस का तस मज़बूत है, उसके ऊपर से गाड़ियाँ गुज़रती हैं और पुल के एक सिरे पर पहुँचते ही बेनीसाव की इमरती की भूख जगा देने वाली जीभ लटपटा देने वाली ख़ुशबू उड़ती रहती।
© डॉ शारिक अहमद खान