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18 दिसंबर आज ही के दिन नूरजहां का देहांत हुआ था

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लेखक असग़र मेहंदी

आज के दिन यानी 18 दिसंबर 1645 को नारी शक्ती की प्रतीक, मुग़ल मलिका नूर जहां का देहांत हुआ था। नूर जहां का असली नाम मेहरुन निसा था, पिता ग़याज़ बेग (एतिमाद उद्दौला d. 1622) मुग़ल साम्राज्य में एक उच्च अधिकारी थे। ग़याज़ बेग के जब हालात ख़राब हुए तो उन्होंने 1576 में तेहरान से हिन्दोस्तान का रुख़ किया और सम्राट अकबर के दरबार से मुंसलिक हो गये।
1594 में नूर जहां का विवाह शेर अफ़्गन (अली क़ुली इस्तज़लु) के साथ हुआ। 1607 में बंगाल के सूबेदार से विवाद में शेर अफ़्गन की हत्या हो गयी। इस घटना के चार साल बाद 33 वर्षीया विधवा मेहरून निसा से जहांगीर ने विवाह कर लिया और पहले नूर महल और बाद में नूर जहां के लक़ब से नवाज़ा।
जहांगीर पर नूर जहां के प्रभाव को काफ़ी नकारात्मक तरीक़े से पेश किया जाता है और इस विषय पर डॉक्टर बेनी प्रसाद ने ‘अ हिस्ट्री आव जहांगीर’ में काफ़ी कुछ लिखा है। वह नूर जहां, एतिमाद उद्दौल, आसफ़ खाँ और शहज़ादा ख़ुर्रम (शाहजहाँ) पर मुबनी एक गुट की परिकल्पना पेश करते हैं जो 1611 से 1620 तक प्रभावी रहा।हिन्दोस्तान के इतिहास लेखन की एक समस्या यह भी है कि फ़ारसी व दीगर स्रोत की भाषायी नादारी की वजह से विदेशी स्रोत पर कुछ ज़्यादा ही तकिया कर लिया गया है। डॉक्टर बेनी प्रसाद ने भी यूरोपीय स्त्रोतों ख़ासकर टोमस रो पर ज़्यादा भरोसा किया है। जबकि टोमस रो ने अपने जर्नल और पत्राचार में अपनी नाकामियों की वजह नूर जहां और आसफ़ ख़ान को ठहराने की कोशिश की है। इसके अतिरिक्त यूरोपीय लेखन में अफ़वाहें मुख्य आधार बनती हैं। हक़ीक़त यह है कि नूर जहां की सक्रिय सियासी भूमिका पिता की मृत्यु और पति के स्वास्थ्य के गिरने के बाद शुरू होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1622 ई के बाद नूर जहां द्वारा शासकीय आदेशों, फ़रमानों को dictate और जारी करने का अमल शुरू होता है।
शहज़ादों की महत्वाकांक्षयें और दरबारियों के इंट्रीग्ज़ की समझ नूर जहां को काफ़ी थी। 1625-1626 के दौरान महाबत ख़ान के coup को जिस हिकमत ए अमली के साथ नूर जहां ने विफल किया है उसकी मिसाल इतिहास में अन्यत्र मिलना मुश्किल है। लेकिन, जहांगीर की मौत के साथ हालात पलट गये क्योंकि गृह युद्ध में आसफ़ ख़ान ने ख़ुर्रम का पक्ष लिया और 26 फ़रवरी 1628 को शाहजहाँ के पुत्रों -दारा शिकोह, शुजा और औरंगज़ेब को नूरजहां के संरक्षण से आज़ाद करा कर आसफ़ ख़ान आगरा पहुँचा। नूरजहां को दो लाख पेन्शन सालाना की पेंशन मंज़ूर हुई और बाक़ी की ज़िंदगी सियासत से दूर लाहौर में गुज़ारते हुए 1645 में इस दुनिया से गुजर गयीं।
नूर जहां ने तक़रीबन सभी क़िस्म की फ़ुनुन ए लतीफ़ा (fine arts) में अपना योगदान दिया है। ‘रूह गुलाब इत्र’ की खोज नूर जहां से मंसूब है लेकिन तुज़ुक ए जहांगीरी में जहांगीर ने इसका श्रेय नूर जहां की माँ अस्मत बेगम को दिया है। आगरा का एतिमाद उद्दौला का मक़बरा वास्तुकला का एक अनमोल नमूना है जिसे नूर जहां ने छः साल में निर्माण कराया था। इस मक़बरे की तफ़सील बयान करने के लिये एक पोस्ट नाकाफ़ी है। संक्षेप में इतना काफ़ी है कि यह इमारत मुग़ल वास्तुकला के ट्रैंज़िशन को दर्शाती है जिसका इख़्तिताम ताजमहल पर होता है। टेक्स्टायल और फ़ैशन के क्षेत्र में नूर जहां का योगदान अनमोल है। अनेक क़िस्म के मंसूज (textile) और लिबास: नूरमहली पोशाक, पंचतोलीया बादला, किनारी के डिज़ाइन का श्रेय नूर जहां को है।
नूर जहां एक अफ़ाक़ी और आलम गीर शक़्सियत की हामिल है और संस्कृति, साहित्य और कला की तक़रीबन समस्त विधाओं में नूर जहां का ज़िक्र हुआ है। नूर जहां को नारी शक्ती कि एक अलामत और इतिहास के एक अनमोल रत्न के तौर पर पेश ना करना भारतीय इतिहास लेखन की एक भयंकर भूल है जिसका सुधारा जाना वक़्त की अहम ज़रूरत है।
कुछ कड़वी बातें भी बयान हो जायें जो आम तौर पर बतायी नहीं जातीं। 18 वीं सदी में जब पंजाब में सिक्ख वर्चस्व का दौर शुरू हुआ तो लूट-खसोट के नये आयाम भी स्थापित हुए। इनके अत्याचारों से नूर जहां का मक़बरा भी महफ़ूज़ नहीं रह सका। “ख़ालसा” के इस पुर आशोब दौर में नूर जहां का ताबूत ज़मीन से खोद दिया गया और हीरे जवाहरात पर हाथ साफ़ किये गये,, और बाद में जिस जगह ताबूत को ये लटका छोड़ कर गए थे मुलाज़िमों ने उसी जगह पर दुबारा ताबूत को दफ़नाया दिया।

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