लखनऊ, 27 मार्च 2026: लखनऊ विश्वविद्यालय के 200 साल पुराने ऐतिहासिक लाल बारादरी भवन को अचानक सील कर दिया गया, जहां दशकों से मुस्लिम छात्र-छात्राएं, शिक्षक और कर्मचारी नमाज़ अदा करते आ रहे थे। बिना किसी पूर्व सूचना, लिखित आदेश या तकनीकी रिपोर्ट के यह कदम उठाए गए, जिससे छात्रों में सांप्रदायिक तनाव फैलने का डर पैदा हो गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने भवन को जर्जर बताकर फेंसिंग लगाई, लेकिन कोई वैज्ञानिक प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया।
छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन करार दिया, जो धर्म के आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है। उनका कहना है कि प्रशासन “सांप्रदायिक संविधान” थोप रहा है, जबकि परिसर में विदेशी मुस्लिम छात्र भी रहते हैं—यह भारत की सेकुलर छवि को धूमिल करने वाला कदम है।
प्रमुख नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया
मौलाना कल्बे जवाद ने कहा, “मैं खुद यूनिवर्सिटी का छात्र रह चुका हूं और यहां नमाज़ पढ़ चुका हूं। हमेशा भाईचारा रहा, लेकिन खास लोगों के इशारे पर माहौल सांप्रदायिक बनाया जा रहा। प्रशासन दबाव में है—दुबारा मूल्यांकन कर नमाज़ की इजाज़त दें।”
डॉ. नीरज जैन बोले, “यूनिवर्सिटी में हर धर्म के लोग हैं। नमाज़ पढ़ना कोई गुनाह नहीं। सीलिंग की निंदा करता हूं—या तो वैकल्पिक जगह दें या यह स्थान खोलें।”
मौलाना सूफियान निजामी ने अपील की, “विश्वविद्यालय समरसता का प्रतीक है, उन्माद की प्रयोगशाला नहीं। जर्जरता का बहाना है तो संरक्षण की जिम्मेदारी हमें सौंप दें—हम मरम्मत कर इसे फिर से उपयोगी बनाएंगे।”
मांगें: समानता और संरक्षण
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि प्रशासन संविधान के अनुरूप समानता सुनिश्चित करे, भवन खोले या वैकल्पिक नमाज़ स्थल प्रदान करे। छात्रों का मानना है कि यह कदम जानबूझकर तनाव बढ़ाने वाला है, और विदेशी छात्रों की मौजूदगी में भारत की छवि पर बट्टा लगाएगा। मामला गरमा रहा है, और विश्वविद्यालय से शीघ्र स्पष्टीकरण की उम्मीद
लखनऊ यूनिवर्सिटी में नमाज़ स्थल सील: धार्मिक भेदभाव का आरोप, मौलाना कल्बे जवाद समेत नेताओं ने की निंदा!





