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यलदा की मुबारक बाद

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ईरानी कैलेंडर के नौवें और दसवें माह की रात यानी 21 दिसंबर साल की सबसे लंबी और सबसे अंधेरी रात का पारसी धर्म में ख़ास अहमियत है, इसे शब ए यलदा या चिल्ले के नाम से जाना जाता है। ईरानी तहज़ीब (जिसका वुस’त सेंट्रल एशिया, अफ़ग़ानिस्तान से आगे तक है) में, इस रात सब दोस्त और ख़ानदान के लोग एक साथ खाने, पीने और शायरी (ख़ास तौर पर हाफ़िज़) और शाहनामे पढ़ने के लिए आधी रात के बाद तक इकट्ठा होते हैं। फल और मेवे खाए जाते हैं और अनार और तरबूज ख़ास रूप से क़ाबिल ए ज़िक्र हैं। इन फलों का लाल रंग भोर के लाल रंग और जीवन की चमक का प्रतीक है। दीवान-ए हाफ़िज़ से नज़्में, जो ज़्यादातर ईरानी घरों की लाइब्रेरी की ज़ीनत (हमारी भी) हैं, इस त्योहार पर पढ़ी या पढ़ायी जाती हैं।

ईरान में शब-ए यल्दा को सरकारी तौर पर 2008 में एक ख़ास तक़रीब के तौर पर ईरान की क़ौमी तातील की फ़ेहरिस्त में जोड़ा गया है।
असग़र मेहदी

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