सुप्रीम कोर्ट ने मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच विवादों में तेजी से सुनवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में देरी से निर्णय लेने का मतलब है कि दोनों पक्षों को नुकसान होता है – मकान मालिक को अपनी संपत्ति का लाभ नहीं मिलता, जबकि किरायेदार को भारी रकम चुकानी पड़ सकती है।
*सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी*
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने बंबई हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से लंबित मामलों की समीक्षा करने और आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया। पीठ ने कहा कि मकान मालिक-किरायेदार विवादों में एक पक्ष के संपत्ति के लाभ से वंचित होने और दूसरे पक्ष के मौद्रिक लाभ से वंचित होने का पहलू भी शामिल होता है।
*न्यायिक प्रक्रिया में देरी के परिणाम*
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देरी के कारण मकान मालिक को संपत्ति नहीं मिलने से नुकसान होता है, जबकि किरायेदार को बड़ी रकम चुकानी पड़ सकती है। कोर्ट ने जोर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय प्रदान करना है, न कि इसका उपयोग दूसरों के अधिकारों को हड़पने के लिए करना ¹ ²।





