दिलीप कुमार साहब एक तवील जिन्दगी पायी, पूरा एक युग जिये, उनकी हयात से लगता था, हमारी पहुॅच भी 20वीं सदी के शुरु तक जाती है, वरना तो 80 फिसदी लोग तो 20वी सदी के आखरी दौर के ही है।
दिलीप साहब की इतनी तवील जिन्दगी की सबसे ख़ास वजह सायरा बानों और उनकी मोहब्बत, इन्सान को मोहब्बत ही जिन्दा रख सकती है, वह भी जिन्दगी के साथी की।
आपको ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे, जिन्हांेने अपने परिवार से दूरी बनायी, वह इस दुनिया से जल्दी चले गये जैसे राजेश खन्ना व विनोद खन्ना आदि जबकि उनसे उम्र में बड़े धमेन्द्र या बारबर के शत्रुघन, अमिताभ व जितेन्द्र अभी चलते-फिरते जिन्दगी बिता रहे है, क्योंकि ये अपने परिवार के करीब है और परिवार इनके करीब है। यह कुछ उदाहरण है…देखेगे तो बहुत से ऐसे उदाहरण फिल जायेंगे।
एस.एन.लाल
ध्यान रहे मै बात कर रहा हूॅं, समाज में स्वीकार की गयी पहली पत्नी के साथ जिन्दगी निभाने की, कुछ भी हो जाये उसका साथ न छोड़ना। पार्टनर बदलकर रखने वाले या बिना पार्टन वालों की बात नहीं कर रहा हूॅ।
दूसरी उनकी लम्बी जिन्दगी की वजह भी सायरा बानों ही थी, एक तीमादार (देखभाल करने वाला) के रुप में, दिलीप साहब की तबयत खराब होने के बाद से सायरा जी अपनी जिन्दगी तज दी थी, उनका सिर्फ एक काम था दिलीप साहब की देखभाल करना। सायरा बानों की मोहब्बत व उनकी तीमारदारी ही हर बार दिलीप साहब को अस्पताल से जिन्दा वापस ले आती थी।
एस.एन.लाल
डाक्टर चाहे जितना अच्छा हो, मरीज़ नहीं बच सकता अगर तीमारदार अच्छा नहीं है तो। तीमारदार अच्छा है, तो मोहल्ले के डाक्टर की दवा भी करामद कर जाती है।
सायरा से बच्चा न होते हुए भी दोनो की मोहब्बत में कोई कमी नही हुई, दिलीप साहब ने दूसरी शादी करके बच्चे के लिए एक कोशिश की, लेकिन उनकी जिन्दगी के पैमाने पर अस्मा ख़री नही उतरी और 2 साल बाद ही तलाक़ ले लिया और फिर सायरा के पास वापस आ गये, और बच्चा न होना उन्होंने खुदा की मर्ज़ी समझकर सब्र कर लिया।
अपना परिवार अपना होता, इन्सान की सेहत व कामयाबी में अपनों (यानि मॉ-बाप, पत्नी व बच्चों) का बहुत बड़ा हाथ होता है, ये कभी नहीं भूलना चाहिए। परिवार को हमेशा साथ रखना चाहिए।