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जवानों की ख़ातिर चीन को जवाब दे सरकार। सैय्यद तक़वी

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भारत और चीन के बीच सैनिकों में टकराव हुआ उसने एक दुखद स्थिति पैदा कर दी जिसमें हमारे कई सैनिक शहीद हो गए इस घटना ने और जवानों की शहादत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया यह बात ठीक है कि नियंत्रण रेखा पर शांति जरूरी है लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि सामने वाला हम पर हमले कर के हमारे सैनिकों की जान ले ले और हम खामोश बैठे रहें। यह कहीं से भी उचित नहीं है फिलहाल जो देश के सीमाओं का हाल है उससे यही जाहिर होता है कि एशिया के इन देशों के आपसी रिश्तो का सारा समीकरण इस वक्त ध्वस्त हो चुका है । एक तरफ पुराना जख्म पाकिस्तान तो अब दूसरी तरफ चीन ने भी ज़ख्म देना शुरू कर दिया और साथ ही साथ नेपाल और बांग्लादेश भी अब हिम्मत करने लगे हैं।
आज भारत चीन सीमा पर पिछले 45 सालों से चली आ रही यथा स्थिति बदल चुकी है चीन का रवैया सुधारने के कोई संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं।
प्रधानमंत्री महोदय ने अपनी वर्चुअल बैठक में इस बात को कहा कि हमारे सैनिक मारते मारते मरे हैं उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा सैनिकों के लिए मरने जैसा शब्द इस्तेमाल करना ठीक नहीं है अपने घर परिवार से दूर जिन्होंने अपनी जान दे दी सही अर्थों में वह मरे नहीं बल्कि देश के लिए शहीद हुए।
पूरे देश की जनता में आक्रोश है हर व्यक्ति चीन को सबक सिखाने और चीनी सामानों की बहिष्कार की बात कर रहा है जो अपने आप में सही है लेकिन यह उम्मीद लगाना बेमानी है कि भारत चीन में कोई सर्जिकल स्ट्राइक या एयर स्ट्राइक जैसे कदम उठाएगा। क्योंकि वक्त बहुत आगे आ चुका है चीन के साथ ₹600000 करोड़ रुपए का कारोबार भारी-भरकम मात्रा में निवेश और लाखों नौकरियां साथ में जुड़ी हुई हैं। इस को संभालने की एक ही संभावना है जो राजनीतिक स्तर पर या कूटनीतिक स्तर पर नजर आ रही है
चीन के साथ किसी भी तरह के संबंध रखने या बनाने से पहले हमें बीते हुए वक्त पर भी नजर रखनी चाहिए क्योंकि जब 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ था तो 12 साल के लिए दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते बिल्कुल खत्म हो चुके थे बाद में जब 1974 में इसे बहाल किया गया तो उसके कुछ ही साल के बाद सिक्किम सीमा पर हमला करके भारत के 4 सैनिकों को शहीद किया गया था अगर इसके आगे बढ़ते हैं तो 1978 में जब तत्कालीन विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी चीन जा रहे थे तो जब वह रास्ते में थे तभी चीनी फौज वियतनाम की सीमा में घुस गई थी। वियतनाम भारत का एक मित्र देश था जिसके बाद श्री बाजपेई ने अपनी यात्रा रद्द कर वापस लौटने का फैसला किया था।
चीन का टकराव सिर्फ भारत के साथ ही नहीं है बल्कि अगर देखा जाए तो ज्यादातर पड़ोसियों से उसके रिश्ते टकराव वाले हैं और वह फिलीपींस वियतनाम ब्रूनेई न जाने किन किन देशों से सीमा विवाद किए हुए है ऐसे में भारत चीन टकराव कोई अचानक होने वाली नई घटना नहीं है बल्कि यह पुरानी घटना है एक नई तारीख में जरूर दुबारा उत्पन्न हुई है।
आज लद्दाख की गलवन घाटी करतूत के बाद चीन को मुंहतोड़ जवाब देने का वक्त आ गया है। जरूरत इस बात की है कि चीन को सामरिक के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी जवाब दिया जाए क्योंकि देश को वास्तविक खतरा चीन से है, सरकारें चीन खतरे के प्रति उदासीन रही हैं। चीन अपने सस्ते सामान से भारतीय उद्योग प्रतिष्ठानों को जबरदस्त नुकसान पहुंचा रहा है इसे हम को समझने की जरूरत है। भारत से हुए मुनाफे का प्रयोग चीन सीमा पर हमारे जवानों के खिलाफ कर रहा है।
गौर करने वाली बात यह है कि भारत चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और चीन के लिए सबसे बड़ा बाजार भारत है ऐसे में आज जरूरत है कि चीन पर व्यापारिक पाबंदियां लगाई जाए और निर्माण कार्य में लगी चीनी कंपनियों का ठेका रद्द हो, स्वदेशी कंपनियों को ठेके मिले। जब तक चीन को आर्थिक रूप से चोट नहीं पहुंचाई जाएगी तब तक बात बनने वाली नहीं है प्रधानमंत्री महोदय जो मेक इन इंडिया की बात करते हैं उस पर देश और हर प्रदेश की सरकार को अमल करना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह प्रधानमंत्री महोदय की बातों को अमल में लाए और नौजवानों के लिए नए उद्योग , व्यवसाय शुरू करने में हर तरीके से सहायता प्रदान करें ताकि प्रधानमंत्री के अनुसार हम आत्मनिर्भर बन सकें।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

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