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ख़ुदा हाफिज़ हसन नसरुल्लाह,रोज़े आखिर मुलाकात होगी

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हम शहीदों को कभी मुर्दा नहीं कहते:अनीस
रिस्क़ जन्नत में मिले,

शान यहां बाकी रहे,

आले रसूल से मोहब्बत करने वाले मौत से नहीं डरते,
क्योंकि मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम की आंखों के नूर जन्नत के शहजादे इमामे हुसैन का यह क़ौल है,
जिंदगी का इख्तिदाम अगर मौत है
तो उसका बेहतरीन इंतिक़ाम शहादत है,
इसी पर अमल करते हुए
शाहीद हसन नसरुल्लाह ने शहादत का जाम पिया,
शाहीद हसन नसरुल्लाह का जन्म लेबनान के बैरूद में 1960 में हुआ,
आपकी शिक्षा बैरूद के उपनगर टायर मे हुई,
वहां पर आप अमल आंदोलन में शामिल हुए,
उसके बाद आपने बादबाल बेक के एक मदरसे में पूर्ण इस्लामी शिक्षा प्राप्त की,
1992 से शहादत दिन 27 सितंबर 2024
तक 48 साल आपने हिज़बुल्लाह अर्थ (ईश्वर की पार्टी) में रहते हुए अनेकों दीनी और इंसानियत के काम अंजाम दिए,
जिसमें से मुख्य ISISI के चुंगुल से भारतीय मूल की नसों को आजाद कराया,
फिलिस्तीन व फिलिस्तीनियों के शाना-बा-शाना होकर दुश्मनो के छक्के छुड़ा दिए,
शहादत के आखरी दिन तक आपने इसराइल को झुका दिया,
27 सितंबर 2024 को लेबनान की राजधानी बैरूद में दुश्मनों द्वारा हवाई हमले में उनकी शहादत हो गई,
कल रविवार को बैरूद के एक स्टेडियम में उनके पार्थिविक शरीर को लाखों लोगों ने काले कपड़े पहनकर, हिज़बुल्ला का झंडा लेकर रोते-बिल्किते सुपुर्द ख़ाक कर दिया,
इस अंतिम संस्कार में 57 मुस्लिम देशों के ज्यादातर प्रतिनिधिमंडल इसमें शामिल हुआ,,
“शाबू ज़ैदी”
केवल इजरायल,ISISI समर्थक देश के अलावा,
लेकिन आज सोशल मीडिया के ज़माने में लोग देख ले सच्चा मुसलमान और बहरूपी मुसलमान में क्या फर्क होता है, जो लोग नहीं जानते हैं वह जान ले इस्लाम में बच्चे,महिलाओं, बूढ़े और बीमार और निहत्था कमजोर को मारना मना है,

जो लोग बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को मार रहे हैं वह बहरूपिया मुसलमान है,
एक सच्चा मुसलमान इंसानियत को बचाने के लिए अल्लाह की राह में अपनी जान कुर्बान कर देता है, जैसे हिज़बूल्ला के सभी सदस्य अपनी शहादत पेश की,

और बहरूपी मुसलमान ऐसे सच्चे लोगों को शाहीद करने वालों के साथ शामिल होते
“शाबू ज़ैदी “

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