आज इस्लामी कैलेंडर के पाँचवें माह “रजब” की 22 वीं तारीख़ है,
आज कूण्डे की नज़र/नियाज़ का एहतिमाम किया जाता है। जराए बताते हैं कि इस नज़र की शुरुआत 120 हिजरी में हुई जबकि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने अपने एक सहाबी की परेशानी को देखते हुए उसके लिए दुआ की और उस सहाबी ने सुबह फ़जर में कूण्डों में ख़ास टिकिया पर नियाज़ दिला कर लोगों को खिला दी। यह घटना 22 रजब 120 हिजरी की है। इसके बाद मुस्लिम समाज में नज़र/नियाज़ की यह परम्परा प्रचलित हो गयी। 15 वीं सदी ईसवी के पाए के आलिम और सूफ़ी अब्दुर रहमान जामी ने भी शवाहिद उन नबुवत में भी इमाम जाफ़र ए सादिक़ (अ) से मंसूब इस नज़र का वज़ाहत के साथ तज़किरा किया है। इसके साथ अनेक सुन्नी-सूफ़ी विद्वानों, जिनमें मुफ़्ती अमजद अली आज़मी, मौलाना मो० सरदार अहमद, सै अहमद क़ादरी, अब्दुल मुस्तफ़ा आज़मी शामिल हैं, ने इस नज़र को जायज़ क़रार दिया है।
बीसवीं सदी (1906)की शुरुआत में यह नज़र शिया समाज में भी बेहद मक़बूल हो गयी।लखनऊ और रामपुर इसके ख़ास मरकज़ थे। इसी दौरान मुसलमानों में वहाबी कल्ट तेज़ी से अपने पैर पसारने लगा और 22 रजब की नज़र/नियाज़ भी इसकी चपेट में आ गयी। पहले 22 रजब (60 हिजरी) कोअमीर ए माविया की वफ़ात से जोड़ा, फिर नज़र/niyazw के ख़िलाफ़ फ़तवों के आधार पर इसकी मुख़ालिफ़त की। वहाबियों का मक़सद सूफ़ी धारा को कमज़ोर करना था जिसमें वह कुछ हद तक कामयाब भी रहे।
22 रजब का त्योहार ख़ालिस कल्चरल त्योहार है लेकिन जिस तरह कट्टरपंथी इसकी मुख़ालिफ़त करते रहे हैं उसका कोई ठोस आधार नहीं मिलता। धर्म, समाज, विज्ञान या फ़लसफ़े की प्युरिटी के नाम पर समाज को मानसिक ग़ुलाम बनाए रखने के कोशिशें होती रहीं हैं लेकिन समाज की अपनी डायनामिक्स होती है जो समाज को आगे बढ़ाती है।
आज लकड़हारे वाली कहानी या अमीर ए माविया की वफ़ात की बात से कूण्डे की नज़र काफ़ी आगे बढ़ चुकी है। आइए लज़ीज़ टिकियों का मज़ा लें और समाज में भाई-चारे की फ़िज़ा को बनाए रखें।
-असग़र मेहदी॥





