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आज के दिन 14 मार्च 1879 को ऐल्बर्ट आइन्स्टायन का जन्म हुआ था

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एनस मिराबिलिस ) लैटिन शब्द है जिसका अर्थ अदभुत या चमत्कारी वर्ष। इस शब्द का प्रयोग उन वर्षों के संदर्भ में किया जाता है जिनके दौरान प्रमुख महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित हुईं। विज्ञान के संदर्भ में तीन अवधियों को इस श्रेणी में रखा गया है।

पहला है 1543 – विज्ञान का वर्ष, इस वर्ष यूरोप में सही अर्थों में वैज्ञानिक क्रांति की शुरुआत हुई। जबकि एंड्रियास वेसालियस ने बेसल में “डी ह्यूमैनी कॉरपोरिस फेब्रिका” (ऑन द फैब्रिक ऑफ द ह्यूमन बॉडी) प्रकाशित की, जिसने मानव शरीर रचना विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति ला दी। इसी वर्ष निकोलस कोपेरनिकस की जर्मनी के नूर्नबर्ग में डी रिवोल्यूशनीबस ऑर्बियम कोएलेस्टियम (ऑन द रेवोल्यूशन ऑफ द हेवनली स्फीयर्स) प्रकाशित की गयी।
दूसरा है 1666 – चमत्कारों का वर्ष, जबकि 23 वर्ष की आयु में न्यूटन ने कैलकुलस, गति, प्रकाशिकी और गुरुत्वाकर्षण में क्रांतिकारी खोजें और आविष्कार किए। प्लेग के प्रकोप से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बंद होने के कारण उन्हें अपने सिद्धांतों पर काम करने का पर्याप्त समय मिला जब वह वह लिवर्पूल अपने घर आ गए। संभवतः इसी वर्ष न्यूटन ने एक पेड़ से एक सेब को गिरते हुए देखा था, और जिससे उन्हें गुरुत्वाकर्षण के नियम को समझने में मदद मिली।
तीसरा है 1904-05 – अल्बर्ट आइंस्टीन का वर्ष, इस अवधि में, 26 वर्ष के अल्बर्ट आइंस्टीन ने ऑन द जेनेरल थेयिरी आफ़ मोलिक्यूलर हीट (आणविक ऊष्मा के सामान्य सिद्धांत पर), फोटोइलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट, ब्राउनियन गति, स्पेशल थेयिरी ओफ़ रिलेटिविटी (सापेक्षता के विशेष सिद्धांत) और प्रसिद्ध एनर्जी-मास (ऊर्जा-द्रव्यमान) समीकरण से संबंधित महत्वपूर्ण खोजों को प्रकाशित किया था। उनके यह पाँच लेख, जिन्हें सामूहिक रूप से उनके एनस मिराबिलिस पेपर के रूप में जाना जाता है, 1904-05 में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका, एनालेन डेर फ़िज़िक में प्रकाशित हुए थे। 1904 में प्रकाशित “ऑन द जेनेरल थेयिरी आफ़ मोलिक्यूलर हीट” आइन्स्टायन ने इस बात की चर्चा की थी कि किसी भी निकाय (सिस्टम) के अणुओं की औसत ऊर्जा में कैसे उतार-चढ़ाव होता है। जिसके आधार पर उन्होंने पदार्थ के मूल क्वांटा के आकार और रेडीएशन की वेवलेंथ के बीच सुगम समीकरण स्थापित करने के आसान तरीक़े की बात की थी।
आइंस्टीन चार साल से प्लैंक और लियोनार्ड के सैद्धांतिक और प्रयोगात्मक कार्यों और निष्कर्षों के सिलसिले से विचार कर रहे थे।
1900 में दिए गए प्लैंक के क्वांटम सिद्धांत ने भौतिकी की दुनिया में उत्सुकता पैदा कर दी थी। इस क्रम में आइन्स्टायन ने जल्दी ही महसूस कर लिया था कि क्वांटम सिद्धांत क्लासिकल भौतिकी को बहुत कमज़ोर करने जा रहा है। इस सम्बंध में उन्होंने बाद में लिखा भी कि प्लैंक के मूलभूत सिद्धांत के आने के तुरंत बाद क्लासिकल भौतिकी की सैद्धांतिक बुनियाद के साथ सामंजस्य बिठाने के प्रयास मुकम्मल तौर पर विफल हो गए थे। यह ऐसा था जैसे उनके नीचे से ज़मीन खींच ली गई हो, और कहीं भी कोई ठोस बुनियाद दिखाई नहीं दे रही हो।
17 मार्च, 1905 को ऐल्बर्ट आइन्स्टायन ने प्रतिष्ठ शोध पत्रिका एनालेन डेर फ़िज़ीक में प्रकाशन हेतु अपना एक शोध पत्र प्रस्तुत किया जिसका शीर्षक था “On Heuristic Point of View Concerning the Protection and Transformation of Light.” शब्द Heuristic का जर्मन पर्याय heuristisch, इसका अर्थ है ऐसी कोई परिकल्पना या तर्क जो किसी समस्या के हल की दिशा में केवल एक सहायक के रूप में कार्य करता है। एक प्रकार से केवल इसे एक अनुमान के तौर पर ले सकते हैं- अर्थात ट्रायल और एर्र मेथड के तौर पर इस पद्धति को इस्तेमाल किया जाता है। आइन्स्टायन ने क्वांटम अवधारणा को शुरुआती दौर से ही एक “अनुमान” के तौर पर रखा और अंत तक वह अपने इस मंतव्य पर क़ायम रहे कि क्वांटा सर्वश्रेष्ठ अनुमानी अवधारणा है जो अनंतिम व अपूर्ण है और जो अंतर्निहित वास्तविकता सम्बंधित निष्कर्षों के साथ पूरी तरह से संगत नहीं है।
इसके पूर्व 1904 में “ऑन द जेनेरल थेयिरी आफ़ मोलिक्यूलर हीट” के प्रकाशन कि बाद
आइन्स्टायन ने अपने दोस्त कोनार्ड हैबिक्ट को सम्बोधित एक पत्र में लिखा था कि उन्होंने क्वांटा के आकार और रेडीएशन की वेवलेंथ के बीच समीकरण को हासिल कर लिया है।
1905 में प्रकाशित उक्त पेपर में उन्होंने प्लैंक द्वारा के गणितीय सूत्र के आधार पर लियोनार्ड के फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव सम्बंधित निष्कर्षों की व्याख्या देने का प्रयास शुरू किया और अपने विश्लेषण में उन्होंने “प्रकाश“ को तरंग की निरंतरता के सिद्धांत को अपनाने के बजाये उसे सूक्ष्म कणों- क्वांटम, से निर्मित सिद्धांत को अपनाया। लेकिन, यह भी ख़याल रखा कि प्रकाश के पार्टिकल नेचर (कण सिद्धांत) के पक्ष में अपना मत रखने से पहले इस बात पर जोर दिया जाये कि प्रकाश के तरंग सिद्धांत को, इसकी उपयोगिता के देखते हुए, नकारने की कोई ज़रूरत पेश नहीं आयेगी। प्रकाश के वेव नेचर (तरंग सिद्धांत) और पार्टिकल नेचर (कण सिद्धांत), दोनों को समायोजित करने के पीछे उनका मक़सद अनुमान पर आधारित कोई क्रांतिकारी परिकल्पना पेश करना था जिसके अनुसार प्रकाश कणों या ऊर्जा के पैकेट से बना है। इस परिकल्पना में जब प्रकाश किरण एक बिंदु से आगे की ओर बढ़ता है तो ऊर्जा स्पेस में वितरित नहीं होती है बल्कि क्वांटा के रूप में विद्यमान रहती है। ऊर्जा के इन पैकेटों को केवल ऊर्जा की पूर्ण इकाइयों के रूप में पैदा और अवशोषित किया जा सकता है।
इस परिकल्पना पर पहुँचने से पूर्व आइंस्टीन ने यह ज्ञात करना चाहा कि क्या डिस्क्रीट क्वांटा से युक्त ब्लैकबॉडी रेडीएशन की मात्रा, डिस्क्रीट कणों से निर्मित गैस की मात्रा की तरह व्यवहार कर सकती है? अपने पूरे अध्ययन में उन्होंने पाया कि मात्रा के आधार पर रेडीएशन की एन्ट्रापी और आदर्श गैस की एन्ट्रापी में होने वाला परिवर्तन एक समान नियम का पालन करता है। आइन्स्टायन को अपनी गणना में एन्ट्रापी के लिए बोल्ट्जमैन के सांख्यिकीय सूत्र का उपयोग किया जिसके आधार पर एक विशेष फ़्रीक्वन्सी पर प्रकाश के एक कण की ऊर्जा की गणना करने का एक तरीका हासिल हो गया, जो प्लैंक द्वारा ज्ञात तरीक़े के अनुरूप निकला। इसके बाद आइन्स्टायन ने प्रकाश के क्वांटा के सिद्धांत के आधार पर लियोनार्ड के फ़ोटोइलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट सम्बंधित प्रायोगिक निष्कर्षों की समुचित व्याख्या पेश की। आइन्स्टायन ने यह अवधारणा पेश की कि प्रकाश के प्रत्येक डिस्क्रीट क्वांटा की ऊर्जा को केवल प्लांक स्थिरांक से गुणा करके प्रकाश की फ़्रीक्वन्सी (आवृत्ति) द्वारा निर्धारित किया जाता है। जिसका सूत्र है, E=hν.
जब प्रकाश किसी धातु के सर्फ़ेस से टकराता है तो उसमें मौजूद “क्वांटम” अपनी पूरी ऊर्जा को धातु में मौजूद इलेक्ट्रॉन में स्थानांतरित कर देता। सर्फ़ेस से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों में जो अधिक ऊर्जा होती है वह सर्फ़ेस पर पड़ने वाले प्रकाश की फ़्रीक्वन्सी पर निर्भर करती है। इसके साथ आइन्स्टायन ने दूसरी बात कही कि प्रकाश की तीव्रता में वृद्धि का सीधा अर्थ यह है कि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की संख्या में वृद्धि तो हो जायेगी लेकिन इनकी ऊर्जा में कोई वृद्धि नहीं होगी। जैसा कि पूर्व में ज़िक्र हो चुका है, लियोनार्ड ने भी ठीक यही पाया था।
इसके साथ आइन्स्टायन ने अपने शोध पत्र में इस तथ्य को विनम्रता के साथ क़ुबूल किया कि उनकी अवधारणाएँ केवल सैद्धांतिक सोच पर स्थापित की गयीं हैं और पूरी तरह से प्रयोगात्मक डेटा से प्रेरित नहीं हैं। अग्रेत्तर यह कि, आइंस्टीन के अनुसार उनकी अवधारणाओं का “मिस्टर लियोनार्ड द्वारा पर्वेक्षित फोटोइलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट के गुणों के साथ कोई टकराव भी नहीं” था। अगर बग़ौर देखा जाए तो प्लैंक ने ब्लैकबॉडी रेडीएशन थेरी के माध्यम से केवल एक अंगारा ही रखा था लेकिन, आइन्स्टायन की फ़ोटोएलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट की सैद्धांतिक व्याख्या ने ऐसी आग लाग लगायी कि क्लासिकल फ़िज़िक्स का पूरा क़िला ही जल कर भस्म हो गया।
आइन्स्टायन ने वास्तव में ऐसा कुछ इंक़लाबी अभिधारणा प्रस्तुत की थी की 1905 के शोध पत्र के प्रकाशित होने के बाद quantum-jump जैसा मुहावरा सामने आ गया।
लेकिन, प्लैंक को आइन्स्टायन की व्याख्या पर एतराज़ था। उनके अनुसार क्वांटम अभिधारणा की उपयोगिता केवल एक गणितीय सुविधा के रूप में थी और इसे मैटर और इनर्जी के बीच इंटरैक्शन के दौरान अर्थात इसके इमिशन और अब्ज़ॉर्प्शन की व्याख्या तक सीमित रखा जाना चाहिए, और इसे भौतिक वास्तविकता के भ्रम से दूर रखना चाहिए। प्लैंक के इस नज़रिए की वजह से इतिहास में उन्हें reluctant revolutionary (अनिच्छुक क्रांतिकारी) के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। जबकि आइन्स्टायन के अनुसार प्रकाश क्वांटम का कॉन्सेप्ट, वास्तव में प्लैंक के गणितीय सूत्र को भैतिकी का वास्तविकता का धरातल फ़राहम कराता है। 1906 में प्रकाशित अपने एक लेख में उन्होंने प्लैंक की आपत्तियों का जवाब दिया था। मूल लेख में उनके द्वारा कुछ तल्ख़ शब्दों का इस्तेमाल भी किया गया था जिसे ने मीकाईल बेस्सो (Michele Besso) के अनुरोध पर हटा लिया गया था। बेस्सो इटैलियन यहूदी मूल के उनके क़रीबी दोस्त थे और उनके निधन से तीन दिन बाद ही 18 अप्रैल 1955 को वह भी चल बसे थे।
आइन्स्टायन की प्रकाश क्वांटम अभिधारणा शुरुआती दौर से ही आलोचनाओं के दायरे में आ गयी थी। इसके पीछे तीन सौ से जारी प्रकाश के तरंग नेचर और पार्टिकल नेचर के बीच जारी द्वंद्वात्मक पृष्ठभूमि भी काम कर रही थी। प्रकाश क्वांटा को एक भौतिक वास्तविकता के तौर पर पेश करने के आइन्स्टायन के प्रयासों के प्रति प्लैंक का प्रतिरोध बरक़रार था। एक दिलचस्प घटना यह है कि 1907-08 में प्लैंक ने आइन्स्टायन को प्रशिया एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में नियुक्ति के लिए प्रस्तावित किया, लेकिन प्लैंक ने अपने सिफ़ारिशी ख़त में अपनी दुविधा के छिपाये बिना लिखा, “हो सकता है कि वह (आइन्स्टायन) कभी-कभी अपने अनुमान में लक्ष्य से आगे निकल गए हों, उदाहरण के लिए उनकी प्रकाश क्वांटम परिकल्पना को उनके ख़िलाफ़ ज़्यादा तवज्जो नहीं दिया जाना चाहिए।” अपनी मृत्यु से ठीक पहले, प्लैंक ने इस तथ्य पर विचार किया कि वह अपनी खोज के निहितार्थों से लंबे समय तक पीछे हट गए थे। यही विडंबना आइंस्टीन के साथ पेश आयी, जिसका ज़िक्र आगे आएगा कि वह भी क्वांटम खोजों के बारे में संदेहजनक हो गाए थे, लेकिन इसके कारण बिलकुल अलग थे।
प्लैंक की भाँति मैक्स लावे (Max Laue) भी केवल इमिशन और अब्ज़ॉर्प्शन के दौरान क्वांटा की भूमिका के क़ायल थे और प्रकाश के “क्वांटा” से निर्मित होने की अभिधारणा के प्रति उन्होंने आइन्स्टायन को सचेत भी किया था। स्पष्ट है कि फोटोइलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट विषयक आइंस्टीन के सिद्धांत ने जो नियम पेश किए थे उन्हें प्रयोगात्मक परीक्षणों के एक दौर से भी गुज़रना था। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रमुख भौतिक शास्त्री, रॉबर्ट मिलिकन ने आइन्स्टायन की प्रकाश सम्बंधित क्वांटम थेयोरी पर संदेह व्यक्त करते हुए इसे ग़लत साबित करने के उद्देश्य से प्रयोग शुरू किए। मिलिकन रवायती वैज्ञानिक थे और अभी भी “ईथर” के वजूद में यक़ीन रखते थे। 1914 में प्रकाशित उनके प्रायोगिक निष्कर्षों से आइंस्टीन के फोटोइलेक्ट्रिक फ़ोरम्युले तो सत्यापित हो गए लेकिन प्रकाश के क्वांटम सिद्धांत पर उनकी अपनी राय बरक़रार रही। वह आइंस्टीन की व्याख्या के बारे में आश्वस्त नहीं थे, उनके अनुसार आइन्स्टायन का फ़ॉर्म्युला फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव के व्यवहार को बहुत सटीक रूप से दर्शाता है, लेकिन एक सिद्धांत के तौर पर यह ख़ारिज करने योग्य है।
लेकिन समय के साथ आइन्स्टायन की फ़ोटोइलेक्ट्रिक थ्योरी और इसका समीकरण भौतिकशास्त्र में स्वीकार्यता हासिल कर गया। 1926 में क्वांटा का वजूद भी सिद्ध हो गया जिसे आज हम फ़ोटान के रूप में जानते हैं। 1920 के दशक में क्वांटम यांत्रिकी के आगमन के साथ, फोटॉन की वास्तविकता भौतिकी का एक मूलभूत हिस्सा बन गई।
1922 में आइन्स्टायन को भौतिकी के 1921 के नोबेल ईनाम से नवाज़ा गया था। इसके अगले साल, 1923 में मिलिकन को प्राथमिक विद्युत आवेश के मापन और फोटोएलेक्ट्रिक इफेक्ट पर उनके कार्य के लिए भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेकिन, क्वांटम फ़िज़िक्स के विकास के साथ जो सवाल और जवाब पैदा हो रहे थे वह अनेक भौतिक-शास्त्रियों को असहज भी कर रहे थे।
आज आइन्स्टायन के जन्मदिन के अवसर पर रसेल-आइन्स्टायन घोषणापत्र (The Russell-Einstein Manifest) का ज़िक्र ज़रूरी है, जो यह चेतावनी देता है कि परमाणु हथियार मानवता के लिये ख़तरा पैदा करते हैं। यह मैनिफ़ेस्टो परमाणु खतरों को संबोधित करते हुए परमाणु हथियारों को ख़त्म अथवा सीमित रखने केलिये प्रयासों का आह्वान करता है। बीसवीं सदी के सबसे प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों में से दो, दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल और भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन का यह मैनिफ़ेस्टो 9 जुलाई, 1955 को आइन्स्टायन की मृत्यु के तीन माह बाद लंदन में यह घोषणा पत्र जारी किया था। उनके इस मैनिफ़ेस्टो में सभी अंतरराष्ट्रीय मामलात के शांतिपूर्ण समाधान का आग्रह किया था।
रसेल-आइंस्टीन घोषणा पत्र (1955)
“हम इस अवसर पर, इस या उस राष्ट्र, महाद्वीप, या पंथ के सदस्यों के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के रूप में, उस प्रजाति के सदस्य, जिसका निरंतर अस्तित्व संदेह में है, की हैसियत से अपनी बात कह रहे हैं।
हम ऐसा कोई शब्द नहीं कहने की कोशिश करेंगे जो जिससे महसूस हो कि हम एक समूह के बजाय दूसरे समूह के लिए अपील कर रहे हैं।
सभी, समान रूप से, संकट में हैं, और, यदि संकट को समझा जाता है, तो आशा है कि वे सामूहिक रूप से इसे टाल सकते हैं। हमें नए सिरे से सोचना सीखना होगा। यहाँ, तो, वह समस्या है जो हम आपके सामने प्रस्तुत करते हैं, घोर और भयानक और ऐसे है जिससे बचना मुश्किल है। क्या हम मानव जाति को समाप्त कर देंगे; या मानव जाति युद्ध का त्याग करेगी? लोगों को इस विकल्प का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योंकि युद्ध को खत्म करना बहुत मुश्किल है। युद्ध के उन्मूलन से राष्ट्रीय संप्रभुता की विकृत सीमाओं की मांग होगी।
लेकिन जो चीज़ शायद स्थिति की समझ को किसी और चीज़ से अधिक प्रभावित करती है वह यह है कि “मानव जाति” जैसा शब्द, अस्पष्ट और अमूर्त (ऐब्स्ट्रैक्ट) महसूस होता है।
लोगों को कल्पना में डर लगता है कि ख़तरा सिर्फ़ उनके और उनके बच्चों और उनके पोते-पोतों के लिए है, और न केवल एक मंद तौर पर समझी जाने वाली मानवीयता के लिए है। वे शायद ही अपने आप को व्यक्तिगत रूप से, और जिन्हें वे प्यार करते हैं, जिनके लिए सोचते हैं की तड़प कर नष्ट होने का अत्यधिक खतरा है, को क़ाबू में रख सकते हैं। इसलिए वे उम्मीद करते हैं कि शायद युद्ध जारी रखने की अनुमति दी जा सकती है बशर्ते आधुनिक हथियारों को प्रतिबंधित कर दिया जाये। यह सिर्फ़ एक वहम है।
हमारे सामने विकल्प है- क्या हम खुशी, ज्ञान, और बुद्धि में निरंतर प्रगति का विकल्प चुनेंगे है। या यह सोच कर कि हम अपने झगड़े नहीं भूल सकते तो मौत को चुनेंगे? हम इंसान के नाते इंसान से अपील करते हैं: अपनी इंसानियत याद रखो, बाक़ी भूल जाओ। यदि आप ऐसा कर सकते हैं, तो रास्ता एक नए स्वर्ग के लिए खुला है; यदि आप नहीं कर सकते, तो आपके सामने सार्वभौमिक मौत का खतरा है। ”
घोषणा पत्र में एक सम्मेलन का आह्वान किया गया जहां वैज्ञानिक बड़े पैमाने पर विनाश के हथियारों द्वारा इंसानियत के पर मंडरा रहे खतरों का आकलन करें। बैठक में राजनीतिक रूप से तटस्थ होने पर जोर दिया गया। इस प्रकार मैनिफ़ेस्टो ने परमाणु हथियारों के सवाल को सभी लोगों और सरकारों तक बढ़ा दिया।
एक विशेष वाक्यांश के ज़रिए इस मैनिफ़ेस्टो के मूल उद्देश्य को व्यक्त किया जा सकता है,
“अपनी इंसानियत याद रखो, और बाकी भूल जाओ। ”
– असग़र मेहदी

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