राज्यसभा में वक्फ संशोधन विधेयक 2024 की कार्यवाही
वक्फ संशोधन विधेयक 2024 को केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने 4 अप्रैल 2025 को राज्यसभा में पेश किया। इसके बाद लगभग 13 घंटे की लंबी बहस हुई, जो देर रात तक चली। मतदान में 223 सांसदों ने हिस्सा लिया, जिसमें 128 ने विधेयक के पक्ष में और 95 ने विपक्ष में वोट डाला। रात करीब 2:30 बजे राज्यसभा में यह विधेयक पारित हो गया। इससे पहले, लोकसभा में यह विधेयक 3 अप्रैल 2025 को रात 1:56 बजे 288-232 के वोट से पारित हुआ था। अब यह विधेयक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पास मंजूरी के लिए जाएगा, जिसके बाद यह कानून बन जाएगा।
विधेयक का उद्देश्य
सरकार ने इस विधेयक को वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता बढ़ाने के लिए पेश किया। इसमें वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम और महिला सदस्यों को शामिल करना, सरकारी संपत्तियों को वक्फ से बाहर करना, और ट्रिब्यूनल के फैसलों के खिलाफ अपील की व्यवस्था जैसे प्रमुख प्रावधान शामिल हैं। सरकार का दावा है कि यह विधेयक धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि प्रशासनिक सुधारों पर केंद्रित है।
पक्ष में सांसदों के बयान (राज्यसभा)
किरेन रिजिजू (केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री, भाजपा)
रिजिजू ने कहा, “यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के कुप्रबंधन को रोकने और पारदर्शिता लाने के लिए है। विपक्ष इसे धार्मिक मुद्दा बनाकर लोगों को गुमराह कर रहा है, जबकि यह सुशासन का कदम है।”
उन्होंने जोर दिया कि जेपीसी ने व्यापक विचार-विमर्श के बाद यह विधेयक तैयार किया, जिसमें सभी पक्षों की राय ली गई।
अमित शाह (केंद्रीय गृह मंत्री, भाजपा)
शाह ने कहा, “वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार देने से संपत्तियों पर कब्जे की शिकायतें बढ़ी थीं। यह विधेयक उस मनमानी को खत्म करेगा और आम मुसलमानों के हितों की रक्षा करेगा।”
उन्होंने विपक्ष पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया और कहा कि यह कानून संविधान के दायरे में है।
जेपी नड्डा (भाजपा अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद)
नड्डा ने कहा, “हमने यूपीए सरकार की तुलना में इस विधेयक पर ज्यादा गंभीरता दिखाई। यह देश को एकजुट करने वाला कदम है, न कि बांटने वाला। विपक्ष भ्रम फैला रहा है।”
उन्होंने इसे महिलाओं और पिछड़े मुस्लिम समुदायों के सशक्तिकरण से जोड़ा।
सुधांशु त्रिवेदी (भाजपा सांसद)
त्रिवेदी ने कहा, “वक्फ बोर्ड की संपत्तियों का दुरुपयोग रोकना जरूरी था। यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता सुनिश्चित करता है।”
विपक्ष में सांसदों के बयान (राज्यसभा)
मल्लिकार्जुन खड़गे (कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता)
खड़गे ने कहा, “यह विधेयक संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। यह अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला है और धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है।”
उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि यह विधेयक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए लाया गया है।
संजय सिंह (आप सांसद)
सिंह ने कहा, “भाजपा दंगों को भड़काने के लिए यह विधेयक लाई है। अगर वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम होंगे, तो मंदिर ट्रस्टों में 80% पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण क्यों नहीं?”
उन्होंने इसे “दंगाई हिंदू” नीति का हिस्सा बताया और धार्मिक सौहार्द्र पर सवाल उठाया।
तिरुचि शिवा (डीएमके सांसड)
शिवा ने कहा, “यह विधेयक संघीय ढांचे और अल्पसंख्यक अधिकारों का उल्लंघन करता है। हम इसके खिलाफ संशोधन लाए, लेकिन सरकार ने सुनवाई नहीं की।”
उन्होंने डिवीजन की मांग की, लेकिन संशोधन खारिज हो गए।
नसीर हुसैन (कांग्रेस सांसद)
हुसैन ने कहा, “जेपीसी में विपक्ष की कोई सिफारिश नहीं मानी गई। यह मुसलमानों के खिलाफ एक साजिश है और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 को कमजोर करता है।”
उन्होंने विधेयक को असंवैधानिक करार दिया।
कपिल सिब्बल (निर्दलीय सांसद, विपक्ष समर्थित)
सिब्बल ने कहा, “यह विधेयक वक्फ की स्वायत्तता छीनता है और सरकार को संपत्तियों पर नियंत्रण देता है। यह धार्मिक आजादी पर हमला है।”
उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
चर्चा का समय: राज्यसभा में 13 घंटे से अधिक की बहस हुई। विपक्ष ने कई संशोधन पेश किए, लेकिन सभी ध्वनिमत से खारिज हो गए।
सहयोगी दलों की भूमिका: जेडीयू और टीडीपी ने विधेयक का समर्थन किया। जेडीयू ने इसे पूर्वव्यापी न करने की शर्त रखी थी, जिसे मान लिया गया।
विपक्ष का हंगामा: कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और सपा ने सदन में जोरदार विरोध किया। कुछ सांसदों ने वॉकआउट की धमकी दी, लेकिन बहस में हिस्सा लिया।
बीजद का रुख: बीजू जनता दल (बीजद) ने अपने सांसदों को कोई व्हिप जारी नहीं किया और कहा कि वे अपनी अंतरात्मा के आधार पर वोट दें।
निष्कर्ष
4 अप्रैल 2025 को राज्यसभा में वक्फ संशोधन विधेयक 2024 पर लंबी बहस के बाद इसे 128-95 के वोट से पारित कर दिया गया। सत्तापक्ष ने इसे सुशासन और पारदर्शिता का कदम बताया, जबकि विपक्ष ने इसे अल्पसंख्यक अधिकारों और संविधान पर हमला करार दिया। अब यह विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इस प्रक्रिया में लोकसभा और राज्यसभा दोनों में तीखी बहस और मतभेद देखने को मिले, जो इस मुद्दे की संवेदनशीलता को दर्शाते हैं।




