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गुरु नानक और सुल्तान लोधी

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धार्मिक कारणों से सिख सम्प्रदाय के नज़दीक सुल्तानपुर लोधी नामक क़स्बे की बहुत अहमियत है। वर्तमान में यह ज़िला कपूरथला में स्थित है। पहली सदी से छठी सदी तक यह क्षेत्र बौद्ध धर्म की गतिविधियों का केंद्र रहा है लेकिन बौद्ध धर्म के भारत में ज़वाल के साथ यह क्षेत्र भी गुमनामी के अंधेरों में गुम ही गया। ग्याहरवीं सदी में इसको ग़ज़नी के सुल्तान महमूद के एक सेनापति सुल्तान ख़ान लोधी ने फिर से बसाया। लेकिन, वर्तमान रूप में इस शहर की 15 वीं सदी में सिकंदर लोधी के हुक्म पर दौलत ख़ान द्वारा नींव रखी गयी। तुज़ुक ए बाबरी के एक हाशिये पर बाबर ने दौलत ख़ान को सुल्तानपुर लोधी को स्थापित करने वाला लिखा है।
जनमसाखी (गुरुनानक के जन्म सम्बंधित कथाएँ) के अनुसार, जिनका संकलन 16वीं सदी के अंत में हुआ है, 1480 के आसपास अनेक कारणों से इनके पिता मेहता कल्यान, जो पटवारी के पद पर कार्यरत थे, इस शहर में अपनी बड़ी बेटी (गुरुनानक जी की बड़ी बहन) ननकी के पास सपरिवार चले आये। ननकी के शौहर जय राम, यहाँ के मोदीख़ाना (grain storage depot) के प्रभारी थे, जो शिक़्क़दर (कमिशनर) दौलत ख़ान लोधी (बाद में लाहौर का गवर्नर) के अधीन था। एक दिन शहर से गुजरने वाली काली बेईं नदी (rivulet) में गुरुनानक स्नान करने गये तो तीन दिन तक नहीं लौटे। जब वह बाहर आए तो उन्हें ज्ञान प्राप्त हो चुका था, उनकी ज़बान पर था, “ना कोई हिंदू ना कोई मुसलमान”। इसके साथ उन्होंने इस बात का भी दावा किया कि उन्होंने “नवखंड” के दर्शन किये हैं। यहाँ पर यह बताना आवश्यक है कि तत्कालीन जुग़राफ़िया के माहेरीन ने पृथ्वी को नौ महाद्वीपों में बाँट रखा था।
स्कालर्स में इस बात पर इत्तिफ़ाक़ है कि गुरुनानकि सुल्तानपुर लोधी में क़रीब एक दशक तक रहे और यहाँ पर अनेक व्यक्तियों से इन्होंने मुनाज़रा (polemical debates) किये। शहर क़ाज़ी इनसे काफ़ी नाराज़ रहता लेकिन गुरुनानक को दौलत ख़ान का संरक्षण प्राप्त होने के कारण वह असहाय था। 1500 ई० के आसपास जब गुरुनानक ने अपने प्रिय शिष्य मर्दाना के साथ सफ़र (उदासी) शुरू किया तो वह मोदिख़ाना में कार्यरत थे।

असग़र मेहदी

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