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मीर तक़ी मीर का असली नाम मीर मोहम्मद तक़ी था: असग़र मेहंदी

“पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने ना जाने गुल ही ना जाने बाग़ तो सरा जाने है”

आज ख़ुदा ए सुख़न मीर तक़ी मीर की 211 वीं बरसी है।

कहते हैं कि दिल्ली उजड़ी तो लखनऊ आबाद हुआ और मीर तक़ी मीर की ज़िंदगी इस कहावत की जीती जागती मिसाल हैं।
मीर तक़ी मीर का असली नाम मीर मुहम्मद तक़ी था, इनका जन्म 28 मई 1723 को आगरा में हुआ था। ज़िंदगी के शुरू के हालात ज़्यादा अच्छे नहीं रहे।वालिद का साया जल्द सर से उठ गया, सौतेले भाई मुहम्मद हसन ने भी अच्छा बर्ताव नहीं किया और जायदाद पर क़ब्ज़ा कर लिया। 11 वर्ष की उमर में बेसहारा मीर दिल्ली पहुँचे, उस वक्त मुहम्मद शाह का ज़माना था,

सियासी तौर पर हिंदुस्तान साज़िशों, मराठा, जाट, सिख शोरिशों से परेशान था। किसी तरह एक नवाब और मुग़ल सैन्य अधिकारी के यहाँ मुलाज़मत मिल गयी लेकिन 1739 में नादिर शाह के हमले और करनाल की जंग में नवाब साहब भी मारे गये तो मीर आगरा लौट आये। आगरा में हालात में कुछ भी बेहतरी ना हुई तो फिर दिल्ली का रुख़ किया और सौतेले भाई के खालू (मौसा) सिराज उद्दीन आरज़ू के साथ रहने लगे। नुकात अल शोरा में मीर ने उनको अपना उस्ताद कहा है लेकिन ज़िक्र ए मीर में मीर जाफ़र अली अज़ीम आबादी और अमरोहा के सआदत अली ख़ान को अपना उस्ताद बताया है।सआदत अली ख़ान ने ही मीर को रेख़ता लिखने को प्रेरित किया था। मीर के साथ ख़ान आरज़ू का बर्ताव अच्छा नहीं था। किसी तरह यहाँ कुछ दिन गुज़ारे लेकिन भाई को यह भी मंज़ूर नहीं हुआ। मीर पर ज़िंदगी की ओर इन घटनाओं का गहरा असर हुआ और अपना दिमाग़ी इलाज भी कराना पड़ा। इसके बाद एतिमाद उद्दौला के नाती रियात ख़ान और उसके बाद जावेद ख़ान ख़्वाजा सरा की नौकरी की। सफ़दर जंग द्वारा जावेद ख़ान की हत्या कराये जाने के बाद कुछ अरसा बेकारी में गुज़रा। इसके बाद कुछ अरसा राजा जुगल किशोर और राजा नगर मल के साथ रहे लेकिन दिल्ली के हालात अब रहने लायक़ नहीं थे।


आख़िरकार वह लखनऊ आ गये, लखनऊ का मेज़ाज कुछ अलग था और दिल्ली के मकतब ए फ़िक्र को जल्दी ज़म करना कुछ मुश्किल था।
एक मुशायरे में अपना परिचय यूँ दिया-

क्या बूद ओ बास पूछो हो पूरब के साकिनों
हम को ग़रीब जान के हंस हंस पुकार के

दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिख़ाब
रहते थे मुंतख़ब जहां रोज़गार के

जिस को फ़लक ने लूट कर वीरान कर दिया
हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के

दूसरे दिन लखनऊ में मीर के ही चर्चे थे, लखनऊ ने इन्हें गले लगाया, आंसू पोछे और पहचान दिलायी।
मीर ने उर्दू के छः दीवान संकलित किये जिनमें ग़जलों के अलावा क़सीदे, मसनवियाँ, रुबाईयां वग़ैरा शामिल हैं। नसर (गद्य) में इनकी तीन किताबें-नुकात अश शोरा, ज़िक्र ए मीर और फ़ैज़ ए मीर हैं। आख़िरी वर्णित किताब अपने बेटे के लिये लिखी थी। उनका एक फ़ारसी दीवान भी मिलता है। मीर ने लखनऊ को भी काफ़ी बुरा भला कहा है लेकिन इसके बावजूद वह ज़िंदगी की आख़िरी साँस तक यहीं रहे और हंगामा खेज़ ज़िंदगी गुज़ारने के बाद 90 साल की उमर में इंतिक़ाल फ़रमाया।

“सिरहाने ‘मीर’ के आहिस्ता बोलो

अभी टुक रोते रोते सो गया है”

मेरी नज़र में मीर ख़ुद से कलाम करने वाले शायर हैं, जो ज़माने के सताये हुए लोगों के दर्द को बयान करते हैं लेकिन इस बयान में करब के साथ गर्व भी झलकता है-

“गुफ़्तगू रेख़्ते में हम से ना कर
यह हमारी ज़बान है प्यारे।”

सारे आलम पर हूँ मैं छाया हुआ
मुस्तनद है मेरा फ़रमाया हुआ

बुलबुल ग़ज़ल सराई आगे हमारे मत कर
सब हमसे सीखते हैं अन्दाज़ गुफ़्तगा का

आख़िर में कर्बला के हवाले से उनके मर्सिये का एक हिस्सा पेश है-

करता है यूँ बयान सुख़न रान ए कर्बला
अहवाल ए ज़ार शाह ए शहीदान ए कर्बला

बाँआंका था फ़ुरात पे मेहमान ए कर्बला
प्यासा हुआ हलाक वह मेहमान ए कर्बला

इंसाफ़ की ना एक ने की चश्म नीम बाज़
खोले सितम के हाथ ज़बानें कियाँ दराज़

क़त्ल ए इमाम मक़सद व तैयारी नमाज़
बदतर थे काफिरों से मुसलमान ए कर्बला

असग़र मेहदी

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