हर साल की तरह इस साल भी आज यानी 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाने का मौका मिला है यूं तो जिंदगी में ऐसा चलन चल रहा है कि भारत में हम रोजाना कोई न कोई दिवस मनाते हैं। विदेशों में भी कोई ना कोई दिवस मनाने की प्रथा बहुत तेजी के साथ आगे बढ़ो रही है। लेकिन इस बार पर्यावरण दिवस का मतलब और अर्थ बहुत ही ज्यादा संजीदा है क्योंकि इस बार उस चीज को याद कर रहे हैं या उस चीज का दिवस मना रहे हैं कि जिसके द्वारा प्रदान की जाने वाली चीज के लिए हम लोगों ने तरस के और तड़प के न जाने कितनों को खो दिया।
विश्व पर्यावरण दिवस लगभग 100 से भी अधिक देशों के लोगों के द्वारा 5 जून को मनाया जाता है। इसकी घोषणा और स्थापना संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा 1972 में हुई थी, हालांकि इस कार्यक्रम को हर साल मनाने की शुरुआत 1973 से हुई। इसका वार्षिक कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र के द्वारा घोषित की गई विशेष थीम या विषय पर आधारित होता है।
हमारे देश में हर काम या तो नकल पर होता है या उल्टा होता है हमारी जो सरकार आती है वह अक्ल से तो काम करती थी सिर्फ नकल करना चाहती है। बस यही इस देश में भी हो रहा है कि पर्यावरण दिवस मनाना है सभी सरकारी दफ्तरों में प्रोग्राम होने और खाना पूर्ति के लिए जगह जगह वृक्षारोपण कार्यक्रम होना है लेकिन इंसाफ से बताइए अभी कुछ वर्ष पहले जब वृक्षारोपण का कार्यक्रम चला था तो हर प्रदेश की सरकार और हर नेता दावा कर रहा था कि अबकी इतने पेड़ लगें हैं कि गिनीज बुक में नाम चला गया। एक रिकॉर्ड बना लिया। ऐसा रिकॉर्ड वैसा रिकॉर्ड । लेकिन आखिर वह पेड़ है कहां? क्या जमीन के अंदर लगाए गए थे या आफिसेज के अंदर लगाए गए थे या फाइलों में वृक्षारोपण किया गया था।
क्या वृक्षारोपण की परिभाषा यही है कि सड़क चौड़ी करने के नाम पर पुराने पेड़ों को काट दिया जाए। आज लखनऊ से निकलने वाली जितनी सड़कें चाहे वह फैजाबाद रोड हो चाहे सुल्तानपुर रोड हो चाहे सीतापुर रोड हो चाहे कानपुर रोड हो आप किसी भी सड़क पर चले जाइए पेड़ों का नामोनिशान नहीं है चटियल मैदान पड़ा हुआ है क्या यही वृक्षारोपण या पर्यावरण दिवस है?
बच्चों को क्लास में भी पढ़ाया जाता है और सरकार में बैठा हुआ हर व्यक्ति जानता है इंसान और पेड़ों में बहुत गहरा रिश्ता है जैसे इंसान के अंदर जान पाई जाती है वैसे ही पेड़ों में भी जान पाई जाती है इंसान और पेड़ परस्पर आदान-प्रदान करते रहते हैं इंसान को ऑक्सीजन की जरूरत होती है जो पेड़ हमें देते हैं और इंसान जो कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है उसे पेड़ ग्रहण कर लेते हैं। वातावरण में संतुलन बना रहता है लेकिन अफसोस यह है कि एक तरफ इंसानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इंसान रक्षा करने वाले पेड़ों की संख्या लगातार कम करता जा रहा है।
इस बार कोविड-19 में इंसान अपनी इस करनी का फल भुगत चुका है कि हर तरफ ऑक्सीजन की कमी नजर आई डॉक्टर्स लोगों को सलाह दे रहे थे कि ऐसी जगह पर रहिए जहां पर पेड़ हों, हवा हो, ऑक्सीजन हो, खुला वातावरण हो। लेकिन हम व्यवसायीकरण और बड़ी बिल्डिंग को बनाने के चक्कर में अपने लिए खुद मुसीबत मोल लेते जा रहे हैं।
अब तो यह आलम है कि आप सड़कों पर निकलिए तो सड़क के दोनों तरफ सन्नाटा नजर आता है जहां एक समय था जब सड़क के दोनों तरफ जामुन नीम बरगद पीपल बरगद के पेड़ दिखाई देते थे लेकिन आज लोगों को आर्टिफिशियल जिंदगी में शायद आर्टिफिशियल पेड़ों की भी चाह ज्यादा हो गई है।
हाईवे चौड़ा करने के नाम पर सबसे बड़ी मूर्खता यह हुई के मौजूदा सड़क के दोनों तरफ लगे पेड़ों को काट दिया गया क्या यह नहीं हो सकता था कि मौजूदा सड़क के दोनों तरफ पेड़ खड़े रहते हैं और उसके बगल में एक सड़क बनाकर इन्हीं पेड़ों को डिवाइडर की तरह इस्तेमाल किया जाता लेकिन क्या किया जाए अक्ल तो घास चरने गई थी।
बहरहाल ।
आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत ।
अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत ॥
अभी भी मौका है कि जिंदगी को बचाइए सरकार का भी कर्तव्य है और साथ-साथ जनता को भी इस तरफ ध्यान देना होगा और यह प्रण करना होगा कि आज इस पर्यावरण दिवस पर और आने वाले अगले साल के पर्यावरण दिवस के बीच में हम सब को अपने घरों के सामने दो पेड़ कम से कम अवश्य लगाने चाहिए। यकीन मानिए अगर हर घर के सामने दो पेड़ लगा दिए गए तो आने वाले समय में न सिर्फ अच्छी और ताजी हवा मिलेगी और आक्सीजन की समस्या नहीं होगी बल्कि इस गर्म माहौल से भी हम अपने को और अपने देश को बचा सकेंगे।
जयहिंद।
सैय्यद एम अली तक़वी
शिक्षाविद एवं वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ