💛💛 #हाजीवारिसपाकऔरएकमजज़ूबवली 🌸🌸
नवासा ए गौसुल आज़म हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा गंजमुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैह के दो बेटे थे और दोनों ही विलायत और बुज़ुर्गी के बहुत ही ऊँचे मकाम पर थे, आपके बड़े बेटे क़य्यूम ए दौरान शाह अहमद मियां थे जो कि मादरज़ात कुतुब थे और छोटे बेटे का नाम हज़रत सय्यद मोहम्मद उर्फ़ सय्यदू मियाँ था और सय्यदू मिया मादरज़ात मजज़ूब थे जो कि 17 साल की उम्र में पर्दा कर गए थे।
बचपन के दौर में एक बार सय्यदू मियाँ बाबा एक दीवार पर बैठे हुए फ़रमाते है कि, “चल मेरे घोड़े !” यह कहते ही दीवार खिसककर चलना शुरु हो गई, जब इस बात की खबर हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमान साहब को हुई तो आपने अपने मजज़ूब बेटे से फ़रमाया कि, “तुमने दरवेशी का राज़ अभी से ही फ़ाश कर दिया, ऐसा नहीं करना चाहिए था “
हज़रत मौलाना फ़ज़्ले रहमान साहब सबको अकसर बताया करते थे कि कोई सय्यदू बाबा को परेशान न किया करे और न ही खलल पैदा किया करे, और किसी भी हाल में उनको न छेड़े क्योंकि वह हमेशा वहदानियत में खोये रहते हैं और मजज़ूब को वैसे भी नहीं छेड़ना चाहिए क्योंकि उनकी जलाली व जमाली कैफ़ियत लोगों की समझ से हमेशा पोशीदा होती है।
इसी तरह जब एक बार हाजी वारिस अली शाह रहमतुल्लाह अलैह गंजमुरादाबाद तशरीफ़ लाते हैं तो हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमान साहब के छोटे बेटे हज़रत सय्यदू मियाँ से मिलने का इरादा करते हैं तो हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा बाबा ने फ़रमाया कि, “अरे उस लड़के के पास तुम कहाँ जाओगे ?”मगर हाजी वारिस अली साहब किब्ला मोहब्बत में मिलने चल दिए और सलाम -दुआ के बाद सय्यदू मियाँ ने ज़ोर से, “या अल्लाह! ” कहा,.. फ़ौरन हाजी साहब वापिस होते हुए बोले कि, “अलहम्दो लिल्लाह! हमारे (घराने) के बच्चे भी ख़ुदा ने ऐसे बनाए हैं, मुझे ऐसा मालूम होता जैसे मेरा सब गुम हो गया, वहां मेरा रुकना मुश्किल हो गया ” इस बात पर हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा गंजमुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैह वारिस पाक से फ़रमाते है कि हम इसी वास्ते तुमको रोकते थे “
हाजी वारिस पाक रहमतुल्लाह अलैह हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा गंजमुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैह से मिलने दो बार गंजमुरादाबाद आए, आप दोनों बुज़ुर्ग आपस में बहुत ही दिली मोहब्बत रखते थे ,हाजी वारिस पाक के खास मुरीद शाह साहब वारसी जो थे वह सईद मुकर्रम हुसैन रहमानी साहब से कहते थे कि हाजी वारिस अली शाह रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते थे कि मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा साहब हुज़ूर ए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछे बग़ैर किसी को मुरीद नहीं करते थे और मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा साहब का वाहिद कमाल यह था कि जिसे चाहते उस मुरीद का हाथ पकड़कर हुज़ूर ए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पकड़ा दिया करते थे और जिसे चाहते उसी वक़्त ज़ियारत ए रसूल का शर्फ़ मिल जाता |
मासूम शाह साहब वारसी कहते थे कि हाफ़िज़ प्यारी साहब कहते थे कि एक बार किसी ने हाजी वारिस पाक से मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा के बारे में पूँछा तो हाजी साहब ने फ़रमाया कि, “हम इतना जानते है कि मौलाना फ़ज़्ले रहमान साहब सरदार ए दो-जहाॅ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इजाज़त के बग़ैर कोई काम नहीं करते और हदीस की सेहत खुद रसूल ए पाक से लेते है -आगे तुम खुद सोच लो”
मौलवी खलीलुर्रहमान पीलीभीती(आला हज़रत के दादा मुफ़्ती रज़ा अली खान अलैहिर्रहमा के उस्ताद) ने हज़रत मौलाना फ़ज़्ले रहमा साहब से जब वारिस पाक किब्ला की रिश्तेदारी को पूँछा तो हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमान बाबा ने बड़ी मसर्रत से फ़रमाया कि वारिस पाक हमारी ननिहाली बिरादरी में आते है और हाजी साहब हमको चच्चा जान कहते हैं, “,इस बुज़ुर्गोना मोहब्बत की मिसाल नहीं मिलती कि हाजी वारिस अली शाह साहब ने फ़रमाया ,”जो हमारा मुरीद है वह इस से पहले हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमान का मुरीद हैं और हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा गंजमुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते है कि जो हमारा मुरीद है, वह हाजी वारिस पाक का मुरीद है “
सय्यद शाह मोहम्मद इब्राहीम साहब सज्जादा हाजी साहब जो थे वह हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमान साहब के बड़े बेटे हज़रत मौलाना अहमद मिया साहब को मामू कहा करते थे, इनके बाद जनाब कल्लन मियाँ साहब गद्दी पर इसलिए न बैठते थे कि देवा और गंजमुरादाबाद जब एक ही घराने से है तो दो सज्जादा कैसे हो सकते हैं ” इस बात पर हज़रत मौलाना शाह दादा अहमद मिया देवा शरीफ़ तशरीफ़ ले गए और फ़रमाया कि बेटा इधर(देवा) का इंतज़ाम तुम करो और उधर (गंजमुरादाबाद) का इंतज़ाम हम करें, फिर कल्लन मियाँ साहब को गद्दी पर हज़रत मौलाना दादा अहमद मिया गंजमुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैह ने बिठा कर पगड़ी बाँधी
किताब :रहमत व नेमत सफ़ा 351-352-353