नगीना के जनादेश पर आमने-सामने मायावती और चंद्रशेखर, EVM से दलित राजनीति तक गरमाई बहस
लखनऊ | 28 सितंबर 2026 | शाबू ज़ैदी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति को लेकर एक नई बहस तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने नगीना से आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद पर सीधा राजनीतिक हमला करते हुए आरोप लगाया कि उनका नगीना में अपना कोई जनाधार नहीं था और भाजपा ने कथित तौर पर EVM में धांधली कर उन्हें चुनाव जिताया। मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि चंद्रशेखर भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।
मायावती ने चुनाव में EVM के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाते हुए बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की। उनका कहना है कि मतदाता के मन में अपने वोट की पारदर्शिता को लेकर किसी तरह की शंका नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने नगीना लोकसभा चुनाव को उदाहरण बनाते हुए चंद्रशेखर आजाद की जीत पर सवाल खड़े किए।
मायावती के बयान के बाद चंद्रशेखर आजाद ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही गई बातों को सुना है और उन्हें इस बात की खुशी है कि अब मायावती ने आजाद समाज पार्टी को एक बड़ी ताकत के रूप में स्वीकार किया है। चंद्रशेखर ने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना की जनता ने उन्हें 5,12,552 वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुना था। उनके मुताबिक यह केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि नगीना के लोगों के भरोसे और प्रेम की जिम्मेदारी है।
चंद्रशेखर ने EVM और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाने को लोकतंत्र में हर व्यक्ति का अधिकार बताया। उन्होंने यह भी कहा कि वह स्वयं चुनाव प्रक्रिया में अधिकतम पारदर्शिता और मतपत्र से चुनाव की मांग करते रहे हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि नगीना की जनता ने जिस विश्वास के साथ उन्हें चुना, उस जनादेश को किसी षड्यंत्र से जोड़ना उन लाखों मतदाताओं की भावनाओं को आहत करता है।
यह विवाद केवल मायावती और चंद्रशेखर आजाद के बीच व्यक्तिगत राजनीतिक टकराव नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति के बदलते स्वरूप की ओर भी संकेत करता है। बसपा लंबे समय तक दलित राजनीति की सबसे प्रमुख राजनीतिक ताकत रही है, जबकि चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी ने विशेष रूप से युवा दलित राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई है।
2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना से चंद्रशेखर आजाद की जीत ने उन्हें संसद तक पहुंचाया। आधिकारिक चुनाव परिणामों के अनुसार उन्होंने 5,12,552 वोट हासिल किए और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 1,51,473 मतों के अंतर से हराया था।
दूसरी ओर, बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी। इसके बाद पार्टी के संगठन, पारंपरिक दलित आधार और नेतृत्व को लेकर राजनीतिक विश्लेषण तेज हुआ है। बसपा के सामने चुनौती केवल चुनावी सीटों की नहीं, बल्कि अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार को बनाए रखने की भी है।
मायावती का राजनीतिक अनुभव और उत्तर प्रदेश में उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल की विरासत आज भी प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय है। उनके शासनकाल के विकास कार्यों और प्रशासनिक फैसलों को समर्थकों के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषक भी अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते रहे हैं। वहीं चंद्रशेखर आजाद की राजनीति आंदोलन, सामाजिक न्याय और युवा भागीदारी पर केंद्रित दिखाई देती है।
दिलचस्प यह है कि दोनों नेता EVM और चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे पर बैलेट पेपर की मांग को लेकर एक समान रुख रखते हैं, लेकिन नगीना के 2024 के जनादेश की व्याख्या को लेकर दोनों के बीच स्पष्ट मतभेद सामने आ गया है।
अब बड़ा राजनीतिक प्रश्न यह है कि उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं के बीच बसपा का पारंपरिक प्रभाव किस रूप में कायम रहता है और आजाद समाज पार्टी का उभरता राजनीतिक प्रभाव किस दिशा में आगे बढ़ता है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह बहस उत्तर प्रदेश की राजनीति में आने वाले महीनों में और महत्वपूर्ण हो सकती है।
