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14 फ़रवरी 1483 ज़हीर उद्दीन मुहम्मद ‘बाबर’ – The Revolution News
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14 फ़रवरी 1483 ज़हीर उद्दीन मुहम्मद ‘बाबर’

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14 फ़रवरी 1483 को फ़िरदौस मकानी ज़हीर उद्दीन मुहम्मद ‘बाबर’ (द टाइगर) का जन्म हुआ था। बाबर को इस महाद्वीप में एक अज़ीम सल्तनत क़ायम करने का शरफ़ हासिल है। सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि बाबर एक योद्धा और एक राजसी राजवंश से था। दूसरी सबसे ज़रूरी बात यह है कि यदि पंद्रहवीं शताब्दी में तैमूरी राजवंश का व्यापक राजनीतिक इतिहास विफलताओं में से एक था, तो सांस्कृतिक संरक्षण की भूमिका में यह कहीं अधिक सफल था।
मुग़ल आगमन के समय, अर्थात सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में भारत का राजनीतिक परिदृश्य बहुत शोचनीय स्थिति में था। सियासी हालात में होने वाले लगातार क्षरण के कारण, सुदूर दक्षिण को छोड़कर लगभग हर जगह संघर्ष, भ्रम और अव्यवस्था थी।
1388 में फ़िरोज़ तुग़लक़ की मृत्यु के बाद पारिवारिक अंतर्कलह से उत्पन्न गृहयुद्ध के नतीजे में केवल छै वर्षों में चार से अधिक शासकों को सिंहासन पर बैठे जिसने साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया को और अधिक तेज़ कर दिया। अंततः नसीरुद्दीन महमूद शाह (1394-1413) ने सत्ता संभाली लेकिन वह अंतिम तुग़लक़ शासक साबित हुआ। 1398 में तैमूर के आक्रमणों के विरुद्ध नसीरुद्दीन महमूद शाह के पास कोई नीति थी और ना साहस जिसका परिणाम एक शर्मनाक पराजय था। तुग़लक़ वंश का स्थान सैय्यद वंश ने ले लिया, जिसके अंतिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह ने 1448 में सत्ता से मोह त्यागते हुए बदायूँ में वास स्थापित कर लिया। जिसके कारण लोदी अफ़गानों को शक्ती में संवर्धन के साथ सत्ता पर आधिपत्य हासिल करने का अवसर प्राप्त हो गया।
पिछली दो शताब्दियों से अफ़ग़ान विभिन्न स्तर पर तुर्कों की सेवा कर रहे थे। यह प्रवासी क़ौम अपनी ताक़त को ऊर्जा, साहस और जोश में तलाशती थी। लेकिन एक नकारात्मक पहलू यह था कि घमंड, क़बीलायी संबद्धता के साथ परस्पर असहमति की भावना की वजह से उनमें एक बिखराव की स्थिति बनी रहती थी। पहले लोदी शासक दौलत ख़ान ने राजनैतिक शून्यता को भरने का प्रयास किया और 1451 में गद्दी सम्भालये हुए धीरे-धीरे अफ़ग़ान संघ के प्रमुख के रूप में दिल्ली में एक नई शक्ति का निर्माण किया। लेकिन सम्पूर्ण अधिकार और शक्ती निहित ना होने के कारण वह केवल शाब्दिक तौर पर ही सुल्तान था। उसके पुत्र सिकंदर (1489-1516) ने भी इसी राजनीतिक दृष्टिकोण के तहत व्यवस्था को बरक़रार रखा। सिकंदर के पुत्र इब्राहीम लोदी (1516-1526) ने पूर्ण राजतंत्र पर आधारित व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया तो उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। इस प्रकार साम्राज्य के प्रभावशाली आकार में होने के बावजूद लोदी शासकों के पास अधिकार के स्वतंत्र स्रोत पर ज़ोर देने के लिए आंतरिक शक्ति का अभाव था। उधर राजस्थान में राजपूत शासकों में भी एकता का अभाव था, उनकी सत्ता बिखरी हुई थी क्योंकि राजपूत कुलों और छोटे-छोटे राज्यों में बँटे हुए थे। लेकिन मेवाड़ के राणा सांगा राजपूत राजाओं के एक संघ का नेतृत्व करने में सक्षम हो गए थे। यह एक ऐसा संघ था जो दिल्ली की अफ़ग़ान सत्ता को चुनौती देता प्रतीत हो रहा था।

1494 में अपने पिता की मृत्यु के समय, बाबर द्वारा ग्यारह साल की उम्र में फ़रग़ना घाटी (उज्बेकिस्तान) में अपनी छोटी सी रियासत की विरासत की सुरक्षा आसान काम नहीं था, जबकि इस पर क़ब्ज़े की नियत रखने वाले अपने चाचा के आक्रमण का सामना करना पड़ा। तैमूरियों के बीच गृह युद्ध के कारण, उनके घोर प्रतिद्वंद्वियों, उज़्बेक क़बिलाई संघ को अधिक से अधिक मध्य एशिया पर विजय प्राप्त करने का अवसर मिलता रहता था। बाबर की युवावस्था में इस संघ का प्रमुख चंगेज़ ख़ान का एक और वंशज शिबानी ख़ान था।
1494 के बाद दो दशकों तक बाबर के प्रयास मध्य एशिया में अपने परिवार के साम्राज्य की रक्षा करने और फिर उसे पुनः प्राप्त करने पर केंद्रित थे। उज़्बेक खान ईरानी शाह इस्माइल का भी कट्टर दुश्मन था। सफ़वी ईरानी शाह क्लाइयंट के रूप में कार्य करते हुए, बाबर दो बार न केवल अपनी विरासत, बल्कि अपने चाचा के शहर समरक़ंद को भी पुनः प्राप्त करने में सफल रहा, लेकिन दोनों अवसरों पर उज़्बेक फिर से संगठित हो गए और उसे फिर से बाहर निकाल दिया। ऐसे समय में जबकि बाबर एक छोटी सी सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करते और भटकते हुए और लगभग दरिद्र शरणार्थी का जीवन व्यतीत कर रहा था, दिसंबर 1504 में काबुल पर कब्ज़ा करने के अवसर का लाभ उठाने पर उसकी क़िस्मत आंशिक रूप से बदल गई। काबुल जल्द ही एकमात्र शेष बची तैमूरी रियासत बन गई। लेकिन रियासत के अल्प संसाधन उसकी महत्वाकांक्षाओं पर गतिरोध पैदा कर रहे थे। उत्तर में बाबर द्वारा अपनी पैतृक मातृभूमि पर पुनः कब्ज़ा करने की तमाम आशाएँ उज़्बेकों द्वारा अवरुद्ध होने के कारण, उसका ध्यान दक्षिण की ओर पंजाब और हिंदुस्तान के मैदान की अत्यधिक समृद्ध कृषि भूमि की ओर मुड़ गया। 1525 में कई खोजपूर्ण छापों के बाद बाबर ने अगले तीन वर्षों में दो बड़ी लड़ाइयों में अपने दुश्मनों को परास्त करके उत्तर भारतीय कृषि क्षेत्र के अधिकांश हिस्से पर अपनी “कमज़ोर” पकड़ स्थापित कर ली थी।
तेरहवीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत ने उपमहाद्वीप पर आक्रमण करने के मंगोल/मुग़ल प्रयासों को सफलतापूर्वक रोका था। लेकिन बाबर का आक्रमण इस लिए भी सफल रहा क्योंकि उसने अफ़ग़ान लोदी शासन के भीतर विभाजन और कई कुलीन राजपूत राजाओं के लोदी सल्तनत साथ अप्रिय सम्बन्धों का लाभ भी उठाने में कामयाब साबित हुआ। बाबर को पंजाब के गवर्नर दौलत खान लोदी और इब्राहिम लोदी के चाचा अला-उद-दीन के साथ राजपूताना से राणा सांगा से हिंदुस्तान पर आक्रमण का निमंत्रण मिला था। बाबर को हिंदुस्तान के राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप हेतु दिए गए आमंत्रण का आधुनिक मानकों पर मूल्यांकन अनुचित और ग़ैर-ऐतिहासिक है। इसमें देश के प्रति विश्वासघात जैसा कोई तत्व शामिल नहीं था। यह मामला कुछ असंतुष्ट सरदारों के समूहों द्वारा एक विशेष प्रमुख के स्थान पर किसी अन्य को प्रमुख को नियुक्त करने को दिशा में अपनायी गयी कूटनीति से सम्बंधित था।
बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई में मुख्य लोदी सेना को और अगले वर्ष खानुआ की लड़ाई में राजपूत राजा राणा सांगा के नेतृत्व वाली सेना को कुचल दिया, हालांकि दोनों ही मामलों में “शत्रुओं” की संख्या काफ़ी ज़्यादा थी। बाबर की जीत दुर्जेय मुगल सैन्य उपकरण और उस कौशल के कारण हुई जिसके साथ उसने युद्ध के मैदान में अपने विभिन्न तत्वों का समन्वय किया। उसकी सेना के मूल में उस्ताद अली क़ुली और उस्ताद मुस्तफ़ा के तहत तोपख़ाना था साथ में उसके मंगोल घुड़सवार धनुर्धर थे। बाबर ने लंबे समय से स्थापित सामरिक कौशल और गतिशीलता को तुर्की उस्मानी ख़िलाफ़त मॉडल पर पैदल सेना और तोपखाने के साथ जोड़ा। बाबर के घर में तुर्क सैन्य विशेषज्ञ थे और उसने 1514 में चालदिरान की लड़ाई में सफ़वी शाह इस्माइल के खिलाफ़ तुर्क सुल्तान सलीम प्रथम द्वारा अपनाई गई युद्धक्षेत्र रणनीति के समान ही नीति का इस्तेमाल किया था। वास्तविकता यह थी कि उत्तर भारत में घुड़सवार तीरंदाज़ों, मैदानी तोपख़ाना, हथगोलों से लैस पैदल सेना और भारी घुड़सवार सेना की पहली समन्वित तैनाती देखी गई, जिसका प्रभाव स्थानीय सेनाओं के लिए विनाशकारी सिद्ध होना ही था। इसके साथ बाबर का कुशल नेतृत्व और उसकी मानसिकता, जिसकी तुलना मैकियावेली और पुनर्जागरण के युग में इतालवी अभिजात वर्ग से की जाती है, की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उत्तर भारत की उसकी विजय को राजनीतिक यथार्थवाद और महत्वाकांक्षाओं को उसकी सौंदर्य के प्रति संवेदनशीलता और बौद्धिक जिज्ञासा के साथ जोड़ा जाता है। ख़ानवा युद्ध के दौरान अनेक रोचक प्रसंग हैं जिनमें कुछ का ज़िक्र ज़रूरी है-
आगरा में लगातार समाचार आ रहे थे कि राणा सांगा की सैन्य शक्ती में वृद्धि हो रही है। हसन ख़ान के पुत्र को आज़ाद करने का भी कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला। इसके साथ नासिर ख़ान और जौनपुर व अवध से सहयोगी भी बग़ावत पर उतारू थे। धीर – धीरे शक्ती संतुलन राणा के पक्ष में दिखता नज़र आ रहा था। इस बीच 200 घुड़सवारों की एक टुकड़ी ग़ज़नी से आयी। इस टुकड़ी में एक ज्योतिष मुहम्मद शरीफ़ भी था जिसने आगरा में यह प्रचार शुरू कर दिया कि पश्चिम में आठ सितारे हमारे ख़िलाफ़ हैं। जो भी युद्ध भूमि में पूर्व से दाख़िल होगा, निश्चित उसकी पराजय होगी।
बाबर का नाटकीय तौर पर शराब त्यागने की घोषणा के बाद जबकि वह शराब की बिक्री, transportation, और बनाने की पाबंदी जारी किए जाने के फ़रमान पर दस्तख़त कर रहा था, शाही कवि शेख़ ज़ैन ने “पादशाह” से युद्ध के बाद मुस्लिम जनता पर से कुछ करों के हटाए जाने सम्बंधित फ़रमान पर दस्तख़त करा लिए। युद्ध के बाद मुहम्मद शरीफ़ पहला आदमी था जिसने बाबर को मुबारक बाद पेश की। बाबर को उसकी बातों की वजह से क्रोध तो आया लेकिन उसकी पहले की सेवाओं के बदले उसे धन देकर यह कहते हुए रुख़्सत किया कि आज के बाद वह उसके राज्य में दिखायी ना दे।
मुगल राजवंश ने 1526 से 1857 तक भारत में शासन किया, हालांकि दूसरे सम्राट हुमायूं ने अपने शासनकाल (1530-56) का अधिकांश समय निर्वासन में बिताया और अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत से मुगलों के पास बहुत कम वास्तविक शक्ति थी। सत्रहवीं शताब्दी में अपने चरम पर मुगल साम्राज्य ने कुल वैश्विक आर्थिक उत्पादन के पांचवें हिस्से से अधिक का योगदान दिया था। इस विशाल धन की सहायता से सम्राटों को एक शानदार उच्च संस्कृति – साहित्यिक, कलात्मक और स्थापत्य – के विकास और उन्नति का नया दौर पेश किया। यह संस्कृति मूल रूप में फ़ारसी थी जो मूल भारतीय संस्कृति के साथ उदारतापूर्वक जुड़ी हुई थी और इसके संश्लेषण की प्रक्रिया कई पहलुओं में अद्वितीय और मौलिक थी।
लेकिन, बाबर अधिक समय तक जीवित नहीं रहा, संभवतः ज़हर के असर से केवल 47 साल की आयु में 5 जनवरी 1531 को उसका निधन हो गया।
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बाबर को अपनी मादरी ज़बान तुर्की के साथ साहित्य और शासन की भाषा फ़ारसी पर भी समान अधिकार हासिल था। तुज़क ए बाबरी और तुज़क ए जहांगीरी के बाद केवल महारानी विक्टोरिया के संस्मरण को शोहरत हासिल हुई है। अकबर के दौर में बाक़ायदा अनुवाद विभाग स्थापित हुआ तो तुज़क ए बाबरी का फ़ारसी संस्करण अकबर के समय सामने आया, लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि 1502 से 1503, 1508 से 1519 और जनवरी 1520 से नवम्बर 1525 तक का अहवाल हमेशा के लिये विलुप्त हो गया है। बाबर इस मामले में ख़ुशक़िस्मत था कि उसकी साहित्यिक परवरिश उसकी माँ निगार ख़ानम और नानी दौलत बेगम की निगरानी में हुई थी। जिसकी वजह से वह एक विद्वान होने के साथ एक जिज्ञासु भी था। तुज़क ए बाबरी साथ तुर्की में उसका एक और कार्य- दर फ़िक़ मुबयीन (Exposition of the Islamic Jurisprudence) भी क़ाबिल ज़िक्र है। हक़ीक़त यह है कि बाबर न केवल फारसी साहित्य का शैदायी था बल्कि उसके साम्राज्य ने भारतीय उपमहाद्वीप में फारसी लोकाचार -Indo-Persian तहज़ीब के विस्तार को जन्म भी दिया। इसके अतिरिक्त चित्र-कला की उसकी एक समझ थी जिसके patronage में भी उसका योगदान रहा है।
उज्बेकिस्तान में बाबर को एक राष्ट्रीय नायक माना जाता है। 14 फरवरी 2008 को, उनकी 525 वीं जयंती मनाने के लिए देश में उनके नाम पर डाक टिकट जारी किए गए थे। बाबर की कई कविताएँ लोकप्रिय उज़्बेक लोक गीत बन गई हैं, विशेष रूप से शेराली जोरायेव द्वारा। इसके अलावा बाबर किर्गिस्तान में भी एक राष्ट्रीय नायक है। हमारे निकट बाबर एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व है, जिसके मानवीय गुण-अवगुण का मूल्यांकन जब तत्कालीन परिस्थितियों में किया जाता है तो वह एक कुशल योद्धा, स्कालर और योग्य शासक नज़र आता है। उज़बेकिस्तान में स्थापित उसकी मूर्ति उसके व्यक्तित्व का सही परिचय देती है कि वह किताब दोस्त था।

— असग़र मेहदी
14-2-2024

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