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रिज़वान हैदर साहब: मस्जिद की खिदमत में एक मिसाली ज़िंदगी : शाबू ज़ैदी – The Revolution News
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रिज़वान हैदर साहब: मस्जिद की खिदमत में एक मिसाली ज़िंदगी : शाबू ज़ैदी

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लखनऊ की तहसीलगंज जामा मस्जिद के खिदमतगार, पूर्व डिप्टी एसपी रिज़वान हैदर साहब अब इस फानी दुनिया में नहीं रहे। उनकी वफात ने हर उस शख्स को गमगीन कर दिया,
जो उनकी सादगी और मस्जिद की खिदमत में उनकी बेमिसाल लगन से वाकिफ था। कुरान में अल्लाह तआला फरमाता है:
“जो लोग अल्लाह के रास्ते में अपनी जान और माल से जिहाद करते हैं, अल्लाह के नज़दीक उनका दर्जा बहुत बुलंद है।” (सूरह तौबा, आयत 20)। रिज़वान साहब की जिंदगी इस आयत की तस्वीर थी, जिन्होंने अपनी खिदमत को अल्लाह की राह में समर्पित कर दिया।
मेरी उनसे पहली मुलाकात मेरे हरदिल अज़ीज़ दोस्त के वालिद मरहूम जाफर रज़ा साहब (रिटायर्ड स्टेशन मास्टर) के ज़रिए हुई।
मरहूम जफ़र साहब ने बताया कि रिज़वान साहब डिप्टी एसपी के पद से रिटायर हुए और अपनी सरकारी सेवा में कभी किसी पर दबाव नहीं डाला।

रिटायरमेंट के बाद उन्होंने नवाबी दौर की तहसीलगंज जामा मस्जिद की देखभाल का ज़िम्मा लिया। मेरी दूसरी मुलाकात मस्जिद में जोहर की नमाज़ के दौरान हुई, जब मैंने देखा कि एक पूर्व डिप्टी एसपी मस्जिद में झाड़ू लगा रहे हैं।

मैंने झाड़ू लेने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “आज अल्लाह ने मेरे दिल में यह खिदमत डाली है,
हो सकता है कल तुम्हारा नंबर हो।”

उनकी यह नम्रता और गैरत मेरे दिल को छू गई।

वह सच्चाई को समझने वाले इंसान थे,
जिनमें ज़रा भी गुरूर या घमंड नहीं था।
हदीस में नबी-ए-करीम (स.अ.व.) ने फरमाया:
“जो शख्स मस्जिद की खिदमत करता है,
अल्लाह उसकी खिदमत करता है।
” (सहीह मुस्लिम)।

रिज़वान साहब इस हदीस की जीती जागती मिसाल थे,

उनकी वफात की ख़बर सोशल मीडिया के ज़रिए मिली।
लोग उनके नेक कामों की तारीफ कर रहे थे और उनके इसाले-सवाब के लिए दुआएं कर रहे थे।
मरहूम डॉ. कल्बे सादिक साहब के बेटे, डॉ. कल्बे नूरी ने वीडियो और पोस्ट के ज़रिए उनकी खिदमत को बयान किया। डॉ. नूरी साहब का यह कदम काबिल-ए-तारीफ़ है,

क्योंकि उन्होंने रिज़वान साहब के कामों को धार्मिक फरीज़ा समझकर लोगों तक पहुंचाया।
कुरान फरमाता है:

“और जो नेक काम तुम अपने लिए आगे भेजते हो,
उसे अल्लाह के पास पाओगे।”
(सूरह बक़रह, आयत 110)। रिज़वान साहब की खिदमत यकीनन उनके लिए जन्नत का

रास्ता बनेगी।
मेरी क़ौम के उन लोगों से शिकायत है,
जिन्होंने उनके इंतकाल के बाद उनके कार्यों को उजागर किया,
अगर उनकी जिंदगी रहते लोगों को उनके कार्यों से परिचय कराया गया होता तो

तो यह खिदमत उनकी खाली तहसीलगंज मस्जिद तक सीमित नहीं रहती।

अन्य मस्जिदों की भी देखभाल क़ौम दानिशवर बुजुर्ग और नौजवानों के साथ
उस बड़ी मस्जिद के लिए भी खड़ा किया जाता,
जहां हफ्ते में मिंबर-ए-रसूल से ग़ीबत और बुराई की जाती थी।
उनके खिलाफ अभियान चला कर उनको हटाकर मस्जिद को नमाज़ के लिए दुरुस्त किया जाता।

मेरे उस्ताद मरहूम कहा करते थे, “जो आदिल न हो, उसके पीछे नमाज़ जायज़ नहीं।” रिज़वान साहब जैसे आदिल शख्स की कमी आज हर किसी को महसूस हो रही है।

रिज़वान साहब की खिदमत और सादगी हमेशा याद रहेगी। अल्लाह तआला उनकी मगफिरत फरमाए, उनका रुतबा बुलंद करे और जन्नत-उल-फिरदौस में आला मुकाम अता फरमाए। आमीन।
अपील: उनकी इसाले-सवाब के लिए दुआ करें और उनके नेक कामों को आगे बढ़ाएं। ग़ीबत और बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाएं, ताकि मस्जिदें सच्ची इबादत का मरकज़ बने,

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