मेरठ 30 अप्रैल 220 मेरठ को सांप्रदायिक दंगों के कारण कलंक मिला हुआ हैं वहीं दूसरी ओर यह क्रांतिकारी धरा हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल भी बेहतर तरीके से देना जानती है। यहां जब भी दोनों कौम के भाइयों को किसी के कांधे की जरूरत पड़ी दोनों ही मजहबों के लोगों ने खुले दिल से एक-दूसरे का साथ दिया और अपनी जिम्मेदारी भी निभाई। ऐसी ही एक मिसाल लॉकडाउन और रमजान के बीच मंगलवार को देखने को मिली। जब पुजारी की मौत के बाद मुस्लिम समाज के लोग आगे आए और उन्होंने न सिर्फ अर्थी को कंधा दिया बल्कि अंतिम संस्कार की सभी रस्मों में पूरी तरह से अपनी जिम्मेदारी भी निभाई। शव को कंधा देने में मुस्लिम समाज के लोग अपना रोजा खोला भी भूल गए और जब तक अर्थी को अग्नि नहीं मिल गई रोजा नहीं खोला।