10 मोहर्रम, जिसे यौम-ए-आशूरा के रूप में जाना जाता है, इस्लामिक इतिहास का एक दुखद और महत्वपूर्ण दिन है। यह वह दिन है जब पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के नवासे हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके 72 वफादार साथियों ने 680 ईस्वी (61 हिजरी) में कर्बला के मैदान में सच्चाई, न्याय और इस्लाम की रक्षा के लिए अपनी जानें कुर्बान कीं। यजीद की क्रूर सेना ने इमाम हुसैन, उनके परिवार और साथियों को तीन दिन तक भूखा-प्यासा रखा और फिर बेरहमी से उनकी शहादत दी। इस जंग में इमाम हुसैन के छह महीने के मासूम बेटे अली असगर से लेकर उनके भाई हजरत अब्बास और भतीजे हजरत कासिम तक सभी ने इस्लाम के लिए अपनी कुर्बानी दी। इमाम हुसैन ने यजीद की गैर-इस्लामी नीतियों और अत्याचार के सामने झुकने से इनकार कर दिया, जिससे उनकी शहादत सत्य और इंसानियत की मिसाल बन गई।
आज, 6 जुलाई 2025 को, लखनऊ के तालकटोरा कर्बला में अंजुमन-ए-हुसैनी और अन्य संगठनों के तत्वावधान में यौम-ए-आशूरा के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए। हजारों अज़ादारों और ज़ायरीनों ने इस पवित्र स्थल पर पहुंचकर मातम, नौहाख्वानी और सीना-जनी की। कार्यक्रम में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानियों को याद किया गया। ज़ायरीनों ने प्रोफेट की बेटी हजरत फातिमा ज़हरा (स.अ.) को उनके लाल की शहादत पर ागुज़ारी दी। मजलिसों में उलेमा-ए-कराम ने कर्बला की घटना का वर्णन किया और इमाम हुसैन के धैर्य, त्याग और सत्य के लिए बलिदान के संदेश को लोगों तक पहुंचाया। जुलूस में ताजिए, अलम और जुलजनाह की निशानियां शामिल थीं, जिनकी जियारत कर अज़ादारों ने दुआएं मांगी। जगह-जगह शबील लगाए गए, जहां शरबत और पानी वितरित किया गया।
लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल के रूप में, इस आयोजन में विभिन्न समुदायों के लोग शामिल हुए, जो इमाम हुसैन की शिक्षाओं और भाईचारे के संदेश को दर्शाता है। यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहा, और प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए।