आज जबकि बाबरी मस्जिद के मुकाम पर एक मंदिर की बुनियाद रखी जा रही है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड अपनी बात को दोहराना जरूरी समझता है इस्लामी शरीयत की रोशनी में जहां एक बार मस्जिद कायम हो जाती है वह ता कयामत मस्जिद रहती है लिहाजा बाबरी मस्जिद कल भी मस्जिद थी आज भी है और इंशाल्लाह आइंदा भी मस्जिद रहेगी मस्जिद में मूर्तियां रख देने से पूजा-पाठ शुरू कर देने से या एक लंबे अरसे तक नमाज पर रोक लगा देने से मस्जिद की हैसियत खत्म नहीं हो जाती ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना वली रहमानी ने अपने एक प्रेस बयान में कहा है कि बोर्ड का हमेशा से यह फैसला रहा है कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर या किसी हिंदू इबादतगाह को तोड़कर नहीं बनाई गई अल्लाह का शुक्र है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हमारे इस बात की तस्दीक कर दी सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बाबरी मस्जिद के नीचे से खुदाई में जो आसार मिले वह 12 वीं सदी की किसी इमारत के थे यानि बाबरी मस्जिद की तामीर से 400 साल पहले यानी किसी मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद नहीं बनाई गई सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है बाबरी मस्जिद में 22 दिसंबर 1949 की रात तक नमाज होती रही सुप्रीम कोर्ट का यह भी मानना है कि 22 दिसंबर 1949 में मूर्तियों का रखा जाना एक गैर कानूनी काम था सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी माना कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत एक गैर कानूनी अमल था। अफसोस कि इन तमाम सच्चाईयों को तस्लीम करने के बाद कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में सच्चाई को नजरअंदाज करते हुए हिंदुस्तानी मुसलमानों के जज्बात और एहसास पर वार करते हुए हुए मस्जिद की जमीन उन लोगों के हवाले कर दी जिन्होंने गलत और मुजरिमना तरीके पर उसमें मूर्तियां रखी और उसकी शहादत के जिम्मेदार हुए। बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी ने आगे कहा क्योंकि यह अदालत देश की बड़ी अदालत है लिहाजा उसके फैसले को तस्लीम करने के अलावा कोई चारा नहीं है फिर भी हम यह जरूर कहेंगे कि यह जालिमाना और गलत फैसला है जो दिया गया सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को फैसला जरूर दिया मगर इंसाफ को शर्मसार किया।