मन कुंतुम मौला हो फहाज़ा अली-युन मौला
प्रोफेट मुहम्मद ने ग़दीर के मैदान मे क़ाफिला रुकवाया और पीछे से आने वालों का इंतजार किया,
जब सब आ गए और लगभग 1 लाख लोग जमा हो गए इमाम अली को उठा कर कहा,” मन कुंतुम मौला हो फहाज़ा अली युन मौला ”
जिस पर वहां मौजूद सभी सहाबियों ने अली को इसकी मुबारकबाद पेश की,
साथ ही साथ मै बताता चालूँ कि कौन अली,
प्रोफेट मोहम्मद के चाचा के बेटा,
जिसके पिता ने मोहम्मद को अपने घर में रखकर पाला,
जिसकी पैदाइश ख़ाने काबा में हुए,
सबसे पहले ईमान लाने वाला,
प्रॉफिट की बेटी जनाबे फातिमा के पति,
को मुसलमानो के एक फ़िरक़ा के अलावा इस हदीस का कोई इनकार नहीं करता,
पर मौला का अर्थ,
नेता,प्रशासक,मित्र,स्वामी,
नुयाई,व्यक्ति जिसके पास किसी चीज़ का अधिक
अधिकार में से “मित्र” का अर्थ लेते हैं,
जबकि शिया समुदाय अरबी मौला/ फारसी विलायत दोनों का अर्थ प्रशासक मानते हैं,
शिया समुदाय तर्क देता है कि दोस्त/जनशीन उसी दिन साबित हो गया था,
जिस दिन प्रॉफिट ने इमाम को काफिरों की वजह से अपने बिस्तर पर सुला कर ग़ारे हिरा में अपने एक साथी के साथ चले गए,
वो साथी गारे हिरा मे रो रहा था
(उनका नाम सभी जानते हैं)
प्रॉफिट उनको समझा रहे है बेशक हमारी अल्लाह मदद करेगा,
प्रोफेट मुहम्मद ने जब भी अली को किसी अहैम- बड़े काम के लिए भेजा तो अपना जानशीन घोषित करते हुए भेजा,
उदाहरण के तौर पर मरहब को वासले जहनुम करना या दरे खैबर उखाड़ना हो मित्र /जानशीन कहकर भेजो,
अब बार-बार मित्र जनाशीन कहने का कोई तुक नहीं बनता,
जो लोग गदीर का इनकार करते हैं व खुद प्रॉफिट के जन्मदिन के दिन मधे सहाबा करते है
(यानि सहाबीयों की तारीफ )
जबकि जन्मदिन प्रॉफिट का होता है,
और सभी लोग प्रोफेट मोहम्मद के जन्मदिन पर ईद-उल- मिलादुन्नबी के रूप में मनाते हैं,
इन विलायत से इनकार व मित्र व जनशीन मानने वाले समुदाय के लोगों की किताबों में लिखा है,
हज़रत अबू बकर सिद्दीक (ग़दीर की बधाई देने वाले)
ने कहा कि
मैंने प्रॉफिट मोहम्मद को कहते हुए सुना है कि अली के चेहरे को देखना इबादत (इबादत अर्थ पूजा उपासना) है,
इसी पर दूसरी हदीस पेश करते हुए,
हज़रत आयशा प्रॉफिट की पत्नी ने कहां की मैंने प्रॉफिट मोहम्मद को कहते सुना है कि अली का ज़िक्र
(ज़िक्र अर्थ याद करना) इबादत (उपासना पूजा) है,
इस हदीस का अगर रेफरेंस मालूम करना चाहते हो तो आसान तरीका गूगल पर हदीस सर्च कर सकते हैं,
प्रोफेट मुहम्मद हजरत अली के चेहरे को देखना और उनका जिक्र इबादत कर चुके हैं,
तो अब ग़दीर के मैदान में रुक कर लगभग 1 लाख लोगों का मजमा जमा करके लफ्ज़ मौला का इस्तेमाल किया,
जिस शब्द के अंदर प्रशंसक होने के साथ-साथ व सारे अर्थ भी मौजूद हैं
जिनकी वो पहले घोषणा कर चुके हैं
जैसे जिनका मै दोस्त
उसका अली दोस्त
जिसका मै स्वामी /अनुयाई उसका अली स्वामी /अनुयाई
जिसे मै प्रशासक उसका अली प्रशासक,
अब अपना दिमाग लगाने की आवश्यकता नहीं है,
क्योंकि अली का जिक्र ही इबादत है
????मेरा मक़सद किसी का दिल दुखाना नहीं है पर सोशल मीडिया पर ईद ग़दीर के दिन से मै देख रहा हूं हमारे कौमी भाई इस संबंध में अलग-अलग अपनी राय पेश कर रहे हैं,
क्योंकि मै आशिक़े रसूल हूं
मै आशिक़े अहलेबैत हूँ,
इस वजह से मेरा भी फ़र्ज़ बनता है कि ऐसे कन्फ्यूजन क़ौम से दूर करने की कोशिश करूं ,
ताकि सही बात निकाल कर सामने आ सके और लोगों का ईमान मजबूत हो,
याद रहे मौला अली खुद कह रहे हैं कि
दो तरीके के लोग जहन्नुम में होंगे,
एक वो जो मेरे फ़ज़ायल को बढ़कर कर बयान करते हैं,
दूसरे वो जो मेरे फ़ज़ायल घटा कर बयान करते हैं,
आशिक़े रसूल आशिके अहलेबैत
शाबू ज़ैदी